भोपाल: मध्य प्रदेश के वन विभाग में उस वक्त सनसनी फैल गई, जब 2013 बैच के भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी विपिन पटेल ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। महज 15 दिन पहले जबलपुर योजना सर्कल में डीएफओ (DFO) का पदभार संभालने वाले पटेल के इस फैसले ने प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है। कहने को तो कारण 'व्यक्तिगत' बताए जा रहे हैं, लेकिन विभाग के अंदरूनी सूत्र कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
15 दिन में मोहभंग: आखिर क्या है इस्तीफे की असली वजह?
विपिन पटेल को वन विभाग में एक बेहद अनुशासित और सख्त अधिकारी माना जाता है। उनका हाल ही में अनूपपुर से जबलपुर तबादला हुआ था। लेकिन पदभार ग्रहण करने के दो हफ्ते के भीतर ही उनका सेवा छोड़ना यह संकेत देता है कि वन विभाग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। चर्चा है कि एक ईमानदार अधिकारी को सिस्टम और राजनीतिक रसूख के आगे झुकना मंजूर नहीं था, इसलिए उन्होंने कुर्सी छोड़ना ही बेहतर समझा।
अनूपपुर का वो 'विवाद' जिसने बढ़ा दिया तनाव
सूत्रों के अनुसार, पटेल के इस्तीफे की पटकथा उनके अनूपपुर कार्यकाल के दौरान ही लिखी जा चुकी थी। वहां उन्होंने वन नियमों की धज्जियां उड़ा रहे एक मशीनीकृत लकड़ी कटाई मशीन ऑपरेटर पर सख्त कार्रवाई की थी। बताया जाता है कि यह ऑपरेटर राजनीतिक रसूख रखने वाले लोगों का करीबी था।
इस कार्रवाई के बाद पटेल को सराहना मिलने के बजाय विभागीय नोटिस और जांच का सामना करना पड़ा। जब एक अधिकारी को नियम पालन करने के बदले प्रशासनिक संरक्षण नहीं मिलता, तो मनोबल टूटना स्वाभाविक है। इस्तीफा देने से पहले वे एक महीने की लंबी छुट्टी पर भी थे, जो उनके मानसिक तनाव को दर्शाता है।
फील्ड अधिकारियों पर बढ़ता दबाव और असुरक्षा
विपिन पटेल ने अपने करियर में रीवा, दमोह, सतना और अनूपपुर जैसे चुनौतीपूर्ण जिलों में काम किया। उन्होंने हमेशा वन संरक्षण कानूनों को कड़ाई से लागू किया। लेकिन उनके इस्तीफे ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है:
क्या मध्य प्रदेश में ईमानदार अधिकारियों के लिए काम करना मुश्किल हो गया है?
क्या राजनीतिक हस्तक्षेप वन संरक्षण के आड़े आ रहा है?
पटेल के इस कदम ने फील्ड में तैनात अन्य अधिकारियों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। नौकरशाही हलकों में अब यह सवाल गूँज रहा है कि अगर रसूखदारों पर कार्रवाई करने का इनाम 'विभागीय जांच' है, तो अधिकारी जोखिम क्यों उठाएंगे?
विपिन पटेल का इस्तीफा केवल एक पद का खाली होना नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो अपने ही कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को अकेला छोड़ देती है। वन विभाग के आला अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन अंदरखाने की बेचैनी बता रही है कि यह विवाद अभी और तूल पकड़ेगा।