
विदिशा (मध्य प्रदेश): केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को विदिशा में उस समय पत्रकारों की नाराज़गी का सामना करना पड़ा, जब उनके एक घंटे से अधिक देरी से पहुंचने के कारण स्थानीय पत्रकारों ने उनकी निर्धारित प्रेस कॉन्फ्रेंस का सामूहिक बहिष्कार कर दिया। यह घटना गुरुवार को हुई, जब चौहान जिले के विकास कार्यों की समीक्षा के लिए विदिशा आए थे। पत्रकारों ने इस बहिष्कार को समय के अनादर और मीडिया को पर्याप्त तवज्जो न देने का परिणाम बताया है।
इंतज़ार की लंबी घड़ी: जब टलता रहा प्रेस वार्ता का समय
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान गुरुवार को विदिशा कलेक्ट्रेट में कलेक्टर और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के साथ विकास कार्यों की समीक्षा बैठक कर रहे थे। इस बैठक के बाद, दोपहर 2:00 बजे कलेक्ट्रेट के जनसुनवाई कक्ष में उनकी पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस निर्धारित थी।
निर्धारित समय पर पत्रकार मौके पर पहुंच गए, लेकिन जिस कक्ष में प्रेस वार्ता होनी थी, वहाँ अधिकारी समीक्षा बैठक में डटे हुए थे। पत्रकारों को बाहर इंतजार करना पड़ा। सहायक जनसंपर्क अधिकारी को सूचना दिए जाने के बाद, लगभग 2:30 बजे कक्ष को खाली कराया गया।
लेकिन, पत्रकारों का इंतज़ार यहीं खत्म नहीं हुआ। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के आने की प्रतीक्षा में पत्रकार दोपहर 3:05 बजे तक बैठे रहे। इस दौरान किसी भी अधिकारी ने उनके आने का कोई नियत समय नहीं बताया, बल्कि वे लगातार टालमटोल करते रहे। एक घंटे से अधिक के इस लंबे और अनिश्चित इंतज़ार से पत्रकारों का धैर्य जवाब दे गया।
सामूहिक निर्णय: ‘सभी को एक-दूसरे के समय का ख्याल रखना चाहिए’
इतने लंबे समय तक प्रतीक्षा कराने और मंत्री के न पहुंचने से नाराज़ पत्रकारों ने अंततः प्रेस कॉन्फ्रेंस का बहिष्कार करने का सामूहिक निर्णय लिया और कलेक्ट्रेट से चले गए।
इस बहिष्कार पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पत्रकार संघ के अध्यक्ष सचिन तिवारी ने कहा, “अभी त्यौहार का समय है, सबकी अपनी व्यस्तताएं हैं। त्योहार, परिवार और अपने संस्थान के बीच कामकाज का संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में, इतना लंबा इंतजार करने के बाद भी शिवराज जी का नहीं आना उचित नहीं था। इसलिए सामूहिक निर्णय लेकर उनकी वार्ता का बहिष्कार करना पड़ा। सभी को एक-दूसरे के समय का ख्याल रखना चाहिए।”
पत्रकारों के इस कड़े कदम ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब मंत्रियों और नेताओं के कार्यक्रमों में देरी और उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह घटना प्रशासनिक और राजनीतिक हस्तियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि मीडिया के समय का सम्मान भी आवश्यक है।
यह पहला मौका नहीं है जब राजनेताओं की अति व्यस्तता या विलंब के कारण पत्रकारों ने इस तरह का विरोध दर्ज कराया हो। विदिशा की यह घटना एक बार फिर इस बात पर प्रकाश डालती है कि व्यस्तता चाहे कितनी भी हो, समय की पाबंदी और संवाद स्थापित करने वालों के प्रति सम्मान लोकतंत्र में आवश्यक है।