लेखक, उदय कुमार वर्मा मध्यप्रदेश कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी रहे हैं एवं एसोचेम के पूर्व महासचिव रहे हैं
नई दिल्ली/बस्तर। भारतीय राजनीति और सुरक्षा के गलियारों में इन दिनों एक ही गूँज है—"रेड कॉरिडोर का अंत"। गृह मंत्री अमित शाह ने जब यह घोषणा की कि भारत जल्द ही दुनिया के सबसे लंबे समय से चले आ रहे माओवादी विद्रोह से मुक्त हो जाएगा, तो यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि एक युग के अंत की आहट थी। छह दशकों से जंगलों में सुलग रही यह आग अब बुझने की कगार पर है, लेकिन क्या यह अंत वाकई इतना सरल है?
नक्सलबाड़ी की वो चिंगारी, जो दावानल बन गई
इस कहानी की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई थी। माओ ज़ेडोंग के 'बंदूक की नली से सत्ता निकलती है' वाले विचार से प्रेरित होकर चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नेताओं ने सामंती व्यवस्था के खिलाफ जो बिगुल फूँका, उसने देखते ही देखते आधे भारत को अपनी चपेट में ले लिया।
शुरुआत में यह 'ज़मीन, सम्मान और न्याय' की लड़ाई थी। आदिवासियों और वंचितों के हक की बात थी। लेकिन समय के साथ यह विचारधारा हिंसा के ऐसे चक्रव्यूह में फंसी, जहां विकास का हर रास्ता बारूद से उड़ा दिया गया। 2004 में जब अलग-अलग गुट मिलकर 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)' बने, तब यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया।
जब 200 जिलों में लहराता था लाल झंडा
एक दौर था जब पशुपति (नेपाल) से तिरुपति (आंध्र प्रदेश) तक एक 'रेड कॉरिडोर' की बात होती थी। देश के लगभग 200 से अधिक जिले इसकी जद में थे। करीब 20,000 सशस्त्र कैडर जंगलों में समानांतर सरकार चला रहे थे। स्कूल की इमारतें ढहाई जा रही थीं, सड़कें काटी जा रही थीं और पुलिस की मुखबिरी के शक में अपनों का ही खून बहाया जा रहा था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे 'देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरा' करार दिया था।
ऑपरेशन ग्रीन हंट और रणनीतिक ‘चक्रव्यूह’
सरकार की प्रतिक्रिया शुरुआत में बिखरी हुई थी, लेकिन पिछले डेढ़ दशक में इसमें एक 'सर्जिकल' स्पष्टता आई। सुरक्षा बलों ने सिर्फ बंदूकों का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि 'हार्ट्स एंड माइंड्स' (दिल और दिमाग) जीतने की रणनीति अपनाई।
कोबरा और ग्रेहाउंड्स का खौफ: अर्धसैनिक बलों और विशेष राज्य इकाइयों (जैसे ग्रेहाउंड्स) ने माओवादियों के सुरक्षित किलों में घुसकर उन्हें बेअसर किया।
स्थानीय युवाओं का बल: सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक रहा स्थानीय आदिवासी युवाओं को सुरक्षा बलों (बस्तरिया बटालियन आदि) में शामिल करना। इससे माओवादियों का इंटेलिजेंस नेटवर्क ध्वस्त हो गया, क्योंकि अब उनके सामने 'बाहरी' नहीं बल्कि उनके अपने ही खड़े थे।
सड़क और नेटवर्क: जिन जंगलों में माओवादी छिपते थे, वहां सड़कों का जाल बिछाया गया और मोबाइल टावर लगाए गए। जैसे ही कनेक्टिविटी बढ़ी, माओवादियों का छिपना नामुमकिन हो गया।
आंकड़े दे रहे हैं गवाही: सिमटता दायरा
आज माओवादी गतिविधियां कुछ गिने-चुने इलाकों (जैसे छत्तीसगढ़ के अबुझमाड़) तक सिमट गई हैं। उनके शीर्ष नेता या तो उम्रदराज होकर दम तोड़ रहे हैं या मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। वे अब समझ चुके हैं कि जिस विचारधारा के लिए वे लड़ रहे हैं, वह अब अप्रासंगिक हो चुकी है।
भरोसे की कमी या विकास की नई जंग?
यहीं पर आकर एक गंभीर सवाल खड़ा होता है—क्या बंदूकें शांत होने का मतलब शांति है? माओवाद सिर्फ एक सुरक्षा समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक बीमारी का लक्षण था। जिन इलाकों से इसे समर्थन मिला, वे खनिजों से भरपूर हैं लेकिन वहां के लोग सबसे गरीब हैं। आज जब बगावत कमजोर पड़ रही है, तो वहां बड़ी खनन परियोजनाएं और बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट पहुंच रहे हैं। यदि इन प्रोजेक्ट्स से आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया गया या उन्हें विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया गया, तो यह 'अन्याय' फिर से किसी नए विद्रोह के बीज बो सकता है।
नया मंत्र: दमन नहीं, न्याय
सरकार अब समझ चुकी है कि ताकत से इलाका खाली कराया जा सकता है, लेकिन कब्जा तभी बरकरार रहेगा जब वहां 'न्याय' होगा।
पारदर्शी भूमि अधिग्रहण: ज़मीन छीनने के बजाय सहमति पर ज़ोर देना होगा।
खनिज लाभ में हिस्सेदारी: उस मिट्टी से निकलने वाले धन का एक हिस्सा वहीं के लोगों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होना चाहिए।
संवेदनशील प्रशासन: पुलिस और प्रशासन को आदिवासियों के प्रति अपना रवैया बदलना होगा ताकि वे खुद को इस देश का नागरिक महसूस करें, न कि शिकार।
अंतिम प्रहार का समय
भारत आज माओवादी विद्रोह के 'अंतिम प्रहार' वाले चरण में है। लेकिन यह जीत सैन्य कम और राजनीतिक-नैतिक अधिक होनी चाहिए। माओवादियों की गैर-मौजूदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण है 'भरोसे की मौजूदगी'। यदि शासन सहभागी और जवाबदेह बना, तो लाल गलियारा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा।
60 साल का यह संघर्ष हमें सिखाता है कि लोकतंत्र की जड़ें तभी मजबूत होती हैं जब उसका फल सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे।
