
मनोरंजन डेस्क। सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं होता, कभी-कभी यह समाज के दबे हुए आक्रोश और बरसों पुरानी टीस की एक 'चीख' बन जाता है। 'धुरंधर: द रिवेंज' (Dhurandhar: The Revenge) एक ऐसी ही फिल्म है। इसे आप सिर्फ पर्दे पर चलते हुए दृश्यों की तरह नहीं देखते, बल्कि इसे आप अपनी धड़कनों में महसूस करते हैं। यह फिल्म धीरे-धीरे पर्दे पर नहीं आती, बल्कि एक धमाके के साथ आपके सीने पर दस्तक देती है।
अगर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भाषा में कहें, तो यह 'जॉन विक' की स्टाइल, 'किल बिल' का खूंखार बदला और 'इनग्लोरियस बास्टर्ड्स' जैसी बेबाकी का एक ऐसा घातक कॉकटेल है, जिसे भारतीय दर्शक अरसे से चखना चाहते थे। लेकिन ये तुलनाएं तो सिर्फ तकनीकी हैं, 'धुरंधर' की असली जान उसकी उस रूह में है जो यादों, शिकायतों, गर्व और 'हिसाब बराबर' करने की चाहत से बनी है।
दशकों का दर्द और पर्दे पर मिला इंसाफ
'धुरंधर' सिर्फ हिंसा नहीं दिखाती, यह 'वेंडिकेशन' यानी न्याय दिलाती है। इसकी कहानी भले ही एक एजेंट और एक मिशन के इर्द-गिर्द घूमती हो, लेकिन इसके धागे भारत के उन काले पन्नों से जुड़े हैं जिन्होंने हर हिंदुस्तानी के दिल में गहरे जख्म दिए थे।
फिल्म उन कड़वी यादों को फिर से कुरेदती है—IC-814 विमान का अपहरण, संसद पर हुआ कायरतापूर्ण हमला और 2008 के मुंबई आतंकी हमले का वो खौफनाक मंजर। लेकिन फर्क यह है कि यह फिल्म इन घटनाओं पर सिर्फ आंसू नहीं बहाती, बल्कि एक नया नजरिया पेश करती है। एक ऐसा नजरिया जहां संयम की जगह संकल्प ले लेता है और बेबसी की जगह 'मुंहतोड़ जवाब' की निश्चितता आ जाती है।
जब सिनेमा हॉल बन जाते हैं कुरुक्षेत्र
आज देश भर के सिनेमाघरों में जो तालियां और सीटियां गूंज रही हैं, वो सिर्फ एक बेहतरीन एक्शन सीन के लिए नहीं हैं। वे उस भावना के लिए हैं जिसे दशकों तक भारतीय सिनेमा ने 'शांति और संयम' के नाम पर दबाए रखा था। 'धुरंधर' ने उस पुरानी धारणा को तोड़ दिया कि संयम ही पवित्र है। इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि 'दृढ़ संकल्प और शक्ति प्रदर्शन' भी पवित्र हो सकता है।
यहीं से शुरू होता है वो राजनीतिक नैरेटिव, जिसकी चर्चा हर तरफ है। फिल्म में जिस तरह से एक अडिग और मजबूत नेतृत्व को दिखाया गया है, जो किसी भी कीमत पर झुकना नहीं जानता, वह आज के दौर की जानी-पहचानी राजनीतिक कार्यशैली की झलक देता है। इसे प्रोपेगैंडा कहना शायद अधूरा होगा, क्योंकि यह फिल्म किसी को कुछ नया नहीं सिखा रही, बल्कि यह उस भावना को बड़े पर्दे पर उतार रही है जिसे करोड़ों भारतीय पहले से ही अपने भीतर महसूस कर रहे थे।
शिकायत से शक्ति तक का सफर
बीते कुछ सालों में 'द कश्मीर फाइल्स' और 'द केरल स्टोरी' जैसी फिल्मों ने सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक घावों को दुनिया के सामने रखा। लेकिन 'धुरंधर' उनसे एक कदम आगे निकल गई है। यह सिर्फ घावों को गिनती नहीं है, बल्कि उन्हें भरने के लिए हथियार उठाती है। इसकी दुनिया में किस्मत के भरोसे नहीं बैठा जाता, बल्कि किस्मत को अपनी मुट्ठी में कैद किया जाता है।
फिल्म की दुनिया बहुत स्पष्ट है—यहाँ कोई 'ग्रे शेड' नहीं है। यहाँ या तो नायक है या दुश्मन, या न्याय है या बदला। आज की उलझी हुई दुनिया में, जहाँ हर चीज़ में पेचीदगियां ढूँढी जाती हैं, 'धुरंधर' का यह स्पष्ट और ठोस रुख दर्शकों को चुंबक की तरह खींच रहा है।
खुद को नए सिरे से समझने का आइना
फिल्म के शोर, गोलियों की तड़तड़ाहट और ओपेरा जैसे भव्य एक्शन के पीछे एक खामोश संदेश छिपा है—आत्मविश्वास। यह फिल्म एक ऐसे भारतीय 'स्व' (Self) को दिखाती है जो अब सवाल नहीं पूछता, जो हिचकिचाता नहीं है और जो अंजाम की परवाह किए बिना अपनी बात पर अडिग रहता है।
'धुरंधर' दरअसल एक फिल्म से बढ़कर एक आइना है। यह उस बदलते समाज का आइना है जिसे अब सिर्फ 'सहने' में नहीं, बल्कि 'अंजाम' तक पहुँचाने में यकीन है। यह उस भारत की कहानी है जो अपनी नियति का मालिक खुद बनना चाहता है।
यकीन का एक भव्य प्रदर्शन
फिल्म की असली जीत उसकी दलीलों में नहीं, बल्कि उस जज्बे में है जिसे वह जीकर दिखाती है। फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के ज़हन में एक सवाल देर तक बना रहता है—क्या यह तालियां सिर्फ एक फिल्म के लिए थीं, या उस एहसास के लिए जो हमें बताता है कि अब हम कमज़ोर नहीं हैं?
'धुरंधर' यह यकीन दिलाने में कामयाब रही है कि अब भारत की कहानी का अंत बेबसी के आंसुओं के साथ नहीं, बल्कि ताक़त की गर्जना के साथ होगा। और यही वजह है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर रही है।
लेखक, उदय कुमार वर्मा मध्यप्रदेश कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी रहे हैं एवं एसोचेम के पूर्व महासचिव रहे हैं।