
विदिशा – शहर के बीचोंबीच बिना किसी सरकारी मान्यता के संचालित हो रहा श्री अस्पताल आखिरकार स्वास्थ्य विभाग की नजर में आ गया। वर्षों से बगैर लाइसेंस, पंजीयन और किसी अधिकारिक अनुमति के चल रहे इस अस्पताल को आखिरकार सील कर दिया गया। लेकिन सवाल ये उठता है—क्या सिर्फ अस्पताल को सील कर देने से जिम्मेदारियों की इतिश्री हो जाती है?
कैसे चल रहा था अस्पताल, किसी को खबर क्यों नहीं हुई?
जानकारी के मुताबिक, श्री अस्पताल न सिर्फ ओपीडी चला रहा था, बल्कि मरीजों को भर्ती कर इलाज भी कर रहा था—वो भी पूरी तरह अवैध रूप से। सीएमएचओ डॉ. योगेश तिवारी के अनुसार, “अस्पताल के पास किसी भी प्रकार की वैध अनुमति नहीं थी। हमारी टीम ने निरीक्षण के बाद इसे बंद करवा दिया है। जांच आगे जारी है।”
स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी सवालों में
सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब अस्पताल इतने समय से खुला था, तो स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की नजर अब तक क्यों नहीं गई? क्या वाकई अफसरों की मिलीभगत से यह सब संभव हुआ? क्या यह कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए है?
क्या ये एक अलग मामला है? बिल्कुल नहीं!
इसी हफ्ते मध्यप्रदेश में कई अवैध अस्पतालों का भंडाफोड़ हुआ है:
नर्मदापुरम: मालखेड़ी रोड पर बिना लाइसेंस चल रहा अस्पताल सील
ग्वालियर: एक ट्रॉमा सेंटर में अवैध गर्भपात, अस्पताल का रजिस्ट्रेशन एक साल पहले ही खत्म हो चुका था
पहले भी घट चुकी हैं दर्दनाक घटनाएं
याद कीजिए जबलपुर का न्यू लाइफ केयर हॉस्पिटल—साल 2022 में लगी आग में 8 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद प्रदेश भर में कार्रवाई की बात तो हुई, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं बदला। हाई कोर्ट तक ने निर्देश दिए, लेकिन हालात वही के वही हैं।
अब सवाल ये है:
क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी जवाबदेह बनेंगे?
क्या अगली बड़ी घटना का इंतज़ार किया जा रहा है?
क्या हर बार किसी की जान जाए, तब ही सिस्टम जागेगा?
एक अस्पताल सील हुआ है, लेकिन ज़रूरत है पूरे सिस्टम को "सील" कर दोबारा खड़ा करने की।