विदिशा। धर्म और आस्था की नगरी विदिशा एक बार फिर भक्ति के अनूठे रंग में सराबोर हो गई। संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज की पावन प्रेरणा और आचार्य श्री समय सागर महाराज के शुभाशीर्वाद से, 'शीतलधाम बर्रो वाले बाबा' मंदिर के लिए चार भव्य जिन प्रतिमाओं की ऐतिहासिक आगवानी की गई।
इस भव्य शोभायात्रा ने पूरे नगर को धर्ममय कर दिया। हजारों की संख्या में उमड़े श्रद्धालुओं के सैलाब और जयकारों की गूंज ने यह साबित कर दिया कि विदिशा की धरा पर अध्यात्म की जड़ें कितनी गहरी हैं।
मुनि संघ का मिला मंगल सानिध्य
नगर में विराजमान निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज, मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज एवं मुनि श्री संस्कार सागर महाराज के सानिध्य में यह मंगल आगवानी संपन्न हुई। शोभायात्रा में अनुशासन का अनूठा संगम देखने को मिला। प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि जुलूस के अग्रभाग में सजे-धजे रथों पर चारों प्रतिमाएं विराजमान थीं, जिनके दर्शन के लिए नगरवासी लालायित दिखे।
पुष्पवर्षा और जयघोष से गूंजा विदिशा
जुलूस नगर के प्रमुख मार्गों से निकला, जहाँ कदम-कदम पर नागरिकों ने पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत किया। भक्ति संगीत की धुनों पर झूमते युवा और मंगल पाठ करती महिलाओं ने वातावरण को श्रद्धा और शांति से भर दिया। जुलूस में समाज बंधु अनुशासित पंक्तियों में चलते नजर आए, जो सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बना।
मुनि श्री के प्रवचन: ‘समवशरण में सबको समान अवसर’
शोभायात्रा के उपरांत आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री संभवसागर महाराज ने अपने सारगर्भित प्रवचन दिए। उन्होंने कहा:
> “समवशरण एक ऐसा स्थान है जहाँ हर जीव के लिए समान अवसर होते हैं। मंदिर निर्माण और वेदी निर्माण में हर परिवार की सहभागिता अनिवार्य है। प्रत्येक परिवार के सदस्य की ओर से एक-एक शिला वेदिका में विराजमान होनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस पुण्य कार्य से जुड़ सकें।”
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12 फरवरी से शुरू होगा 'वेदिका शिलान्यास' उत्सव
विदिशा के शीतलधाम में आगामी 12 फरवरी से 15 फरवरी तक भव्य वेदिका शिलान्यास समारोह का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक एकता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यासागर नवयुवक मंडल, महिला मंडलों और स्थानीय युवाओं की सक्रिय भागीदारी रही।
आयोजन की मुख्य विशेषताएं:
अनुशासन: हजारों की भीड़ के बावजूद समाज का अनुशासित व्यवहार।
एकता: सभी आयु वर्ग और मंडलों का सक्रिय सहयोग।
संस्कार: नई पीढ़ी को जैन दर्शन और महामुनिराजों के विचारों से जोड़ने का प्रयास।
यह आयोजन विदिशा के इतिहास में धार्मिक चेतना और नैतिक मूल्यों के अद्भुत संगम के रूप में याद रखा जाएगा।