
विदिशा: जब पुत्र अध्यात्म और वैराग्य की राह पर निकल पड़ता है, तो हर माता-पिता की यही मंगल भावना होती है कि उसके कदम अब संसार की ओर वापस न लौटें। जैसे बेटी को विदा करते समय पिता कहता है कि अब ससुराल ही तुम्हारा घर है, वैसे ही वैराग्य धारण करने वाले पुत्र के लिए भी परिवार यही चाहता है कि वह अपने आत्म-कल्याण के मार्ग पर अडिग रहे।
यह मर्मस्पर्शी विचार निर्यापक श्रमण मुनि संभवसागर महाराज ने स्टेशन जैन मंदिर में व्यक्त किए। उन्होंने सम्यक् दर्शन के 'उपगूहन' और 'स्थितिकरण' अंग पर व्याख्यान देते हुए मुनि वारिसेन और मुनि पुष्पडाल के जीवन का एक अद्भुत प्रसंग सुनाया।
जब राजमहल और 32 रानियों का त्याग कर वन गए वारिसेन
मुनि श्री ने बताया कि राजगृही नगरी के राजा श्रेणिक और महारानी चेलना के पुत्र वारिसेन को जब वैराग्य हुआ, तो उन्होंने वैभवशाली राजमहल और अपनी 32 सुंदर रानियों का मोह त्याग कर दीक्षा ले ली। एक बार मुनि वारिसेन का आगमन पुनः अपनी नगरी में हुआ। आहार चर्या के दौरान उनका पड़गाहन उनके बाल सखा पुष्पडाल के घर हुआ, जिसका विवाह हुए मात्र एक दिन हुआ था।
वारिसेन के उपदेशों से पुष्पडाल इतना प्रभावित हुआ कि उसने भी मुनि दीक्षा धारण कर ली। लेकिन, 12 वर्षों के कठिन तप के बाद भी पुष्पडाल के मन में अपनी पत्नी के प्रति मोह (राग) का एक अंश जीवित था।
गुरु ने रचा 'अनूठा नाटक' ताकि शिष्य का मन न डोल जाए
जब मुनि वारिसेन ने अपने शिष्य पुष्पडाल के मन में छिपे राग को भांप लिया, तो उन्होंने उसके 'स्थितिकरण' (धर्म में स्थिर करने) के लिए एक योजना बनाई। उन्होंने राजा श्रेणिक को संदेश भेजा कि वे दोनों मुनि राजमहल आ रहे हैं और सभी रानियों को श्रृंगार करके तैयार रहने को कहें।
यह सुनकर माता चेलना चिंतित हो गईं कि कहीं उनका बेटा पथभ्रष्ट तो नहीं हो गया? लेकिन जैसे ही मुनि वारिसेन महल पहुंचे और काष्ठ (लकड़ी) की चौकी पर बैठे, उनकी दृढ़ता देखकर माता की शंका दूर हो गई। दूसरी ओर, स्वर्ण की चौकी पर मुनि पुष्पडाल को बैठाया गया।
32 रानियों के बीच भी अचल रहे मुनि वारिसेन
राजमहल में भव्य नवधा भक्ति के साथ आहार चर्या हुई। पुष्पडाल ने देखा कि वारिसेन के सामने उनकी 32 अत्यंत सुंदर रानियाँ मौजूद थीं, लेकिन वारिसेन ने उनकी ओर एक नजर उठाकर भी नहीं देखा। यह देख पुष्पडाल को बोध हुआ कि गुरु ने यह सब उसे समझाने के लिए किया था। उसे अहसास हुआ कि जब गुरु इतनी सुंदर रानियों के बीच विचलित नहीं हुए, तो वह एक पत्नी के मोह में क्यों फंसा है? उसी क्षण उनका राग समाप्त हो गया और वे धर्म में स्थिर हो गए।
> “दूसरों के दोषों पर मौन रहना ही सम्यक् दर्शन की सुरक्षा है”
> प्रवचन के दौरान मुनि निस्सीम सागर महाराज ने कहा कि सम्यक् दर्शन को सुरक्षित रखने के लिए कोई पहाड़ नहीं तोड़ना पड़ता। यदि आप दूसरों के दोषों को ढकना (उपगूहन) और मौन रहना सीख जाएं, तो आप आध्यात्मिक परीक्षा में 101% सफल हो जाएंगे।
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खुद ही शिक्षक, खुद ही विद्यार्थी: मोक्ष मार्ग की परीक्षा
मुनि श्री ने भक्तों को प्रेरित करते हुए कहा कि मोक्ष मार्ग में आपको अपनी नकल करने की पूरी छूट है, लेकिन याद रहे—पेपर भी आपको खुद बनाना है, उत्तर भी खुद लिखना है और उसे चेक भी खुद ही करना है। इस आत्म-निरीक्षण में पूरी ईमानदारी होनी चाहिए ताकि कोई भी विद्यार्थी 'फेल' न हो।
विशेष आयोजन:
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि मुनिसंघ वर्तमान में स्टेशन जैन मंदिर में विराजमान है। प्रतिदिन प्रातः 8:45 बजे से प्रवचन हो रहे हैं, जिसके बाद 'प्रश्नमंच' का आयोजन किया जाता है। सही उत्तर देने वाले श्रावकों को तत्काल पुरस्कृत भी किया जा रहा है।