
सिलवानी, मध्य प्रदेश। धर्मनगरी सिलवानी में आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा में राष्ट्रसंत और दिगंबर जैन संत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने जीवन की आधारशिला पर महत्वपूर्ण प्रवचन दिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि "आपके आचरण में धर्म होगा तभी आप धर्मी कहलाओगे"। मुनिश्री ने नैतिकता और प्रामाणिकता को जीवन का सर्वोच्च आदर्श बनाने का आह्वान किया, जिसे सुनकर सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं का मन आत्मिक ऊर्जा से भर गया।
धर्म जीवन का आधार, जैसे नींव के बिना भवन नहीं टिकता
मुनि श्री प्रमाण सागर ने धर्म को जीवन का अनिवार्य आधार बताया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, "जैसे एक मजबूत नींव के अभाव में कोई भवन खड़ा नहीं रह सकता, ठीक वैसे ही धर्म के अभाव में हमारा जीवन भी टिक नहीं पाता।" उन्होंने स्वीकार किया कि हम सभी धर्म की महिमा और गरिमा से भली-भांति परिचित हैं, और सिलवानी तो पहले से ही धर्मनगरी के रूप में ख्याति प्राप्त है।
संत श्री ने समझाया कि जब से हमने जीवन की शुरुआत की है, तभी से हम अपनी आत्मा के कल्याण के लिए धर्म करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आत्मा का वास्तविक कल्याण तभी संभव है जब हमें अपनी आत्मा का बोध हो।
> “सबसे ज्यादा लोग संस्कार और परंपरागत धर्म करते हैं। आप लोग बहुत भाग्यशाली हैं कि आपकी शुरुआत धर्म से हुई है। इसीलिए जब कोई गुरुदेव आते हैं, तो आप लोग सम्मान में बिछ जाते हैं।”
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सुख-सुविधा नहीं, शांति के लिए करें धर्म
मुनिश्री ने धर्म करने के वास्तविक उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने भक्तों को सचेत करते हुए कहा कि हमें धर्म केवल इस आकांक्षा से नहीं करना चाहिए कि इससे दुर्गति टले और स्वर्ग मिले, या सुख-सुविधा और भोग-विलास की प्राप्ति हो।
उन्होंने जोर दिया, “जीवन में शांति और सद्भावना आए, इसलिए धर्म करना।”
संत श्री ने बताया कि धर्मात्मा व्यक्ति के जीवन में जब कष्ट और मुसीबतें आती हैं, तो उसके अंदर उन कष्टों को सहन करने की अद्भुत शक्ति आ जाती है। उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ का प्रेरक उदाहरण दिया, जिन्होंने लगातार दस भवों (जन्मों) तक भीषण कष्टों को सहा, लेकिन कभी भी अधर्म का सहारा नहीं लिया। धर्मी व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भगवान पार्श्वनाथ के जीवन की ओर देखता है और उसके अंदर सहनशीलता का संचार होता है।
सुविधाओं का विस्तार, पर अशांति का बढ़ना चिंताजनक
मुनि श्री प्रमाण सागर ने तीस साल पहले की सिलवानी और आज की सिलवानी के बीच तुलना की। उन्होंने कहा कि आज भौतिक सुख-सुविधाओं में तो विस्तार हुआ है, लेकिन उसी अनुपात में अशांति भी बढ़ी है।
उन्होंने इस सत्य को स्वर्ग के उदाहरण से जोड़ा: "स्वर्ग में सुख-सुविधा भले ही बढ़ जाए, लेकिन शांति घटेगी।" उन्होंने एक गहरी बात कही कि बड़े लोगों की पीड़ा केवल बड़े लोग ही जानते हैं। आज डिप्रेशन (अवसाद) के मरीज अक्सर सेठ साहूकार और संपन्न व्यक्ति होते हैं, कोई गरीब नहीं। उन्होंने आदि पुराण का हवाला देते हुए बताया कि स्वर्ग के देवता ललितांग भी डिप्रेशन में चले गए थे।
> महत्वपूर्ण संदेश: “धर्म करने से मुसीबतें नहीं टलतीं, व्यक्ति यदि धर्मी होगा तो उसके अंदर सहनशीलता आती है।”
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पूजा-पाठ में केवल मांगना नहीं, आध्यात्मिक चेतना जगाएं
मुनि श्री ने पूजा-प्रार्थना के तरीके पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि हम अक्सर पूजा-प्रार्थना करते समय भगवान को बहुत कुछ सुना आते हैं और बहुत कुछ मांगते भी हैं।
उन्होंने लोगों को आत्ममंथन करने को कहा: “किसके लिए ये गलत कार्य कर रहे हो? खाओगे तो दो रोटी ही।”
मुनिश्री का अंतिम संदेश था कि व्यक्ति को अपने अंदर आध्यात्मिक चेतना जाग्रत करनी चाहिए, जिससे कभी कोई गलत या अनैतिक कार्य करने का विचार मन में ही न आवे। उन्होंने दोहराया, नैतिकता और प्रामाणिकता को जीवन का आदर्श बनाएं, तभी आपका धार्मिक कहलाना सार्थक होगा।
कार्यक्रम की जानकारी
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि मुनिसंघ अभी धर्मनगरी सिलवानी में ही विराजमान है। गुरुवार को सांयकालीन शंका समाधान कार्यक्रम हुआ। शुक्रवार को मान स्तंभ में अभिषेक कर मूर्ती विराजमान की जाएगी और मुनि श्री का विशेष प्रवचन होगा।