
बहराइच (उत्तर प्रदेश):
शादी की हर रस्म पूरी हो चुकी थी। मंडप सज चुका था, रिश्तेदार जुट चुके थे और दुल्हन हाथों में मेहंदी और लाल जोड़े में बैठी सात फेरे लेने का इंतजार कर रही थी। लेकिन ये इंतजार कभी खत्म नहीं हुआ। क्योंकि जिस बारात के आने की बाट जोही जा रही थी, वो दहेज की भूख के चलते कभी आई ही नहीं।
यह शर्मनाक घटना उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की है, जहां दहेज की मांग पूरी न होने पर दूल्हा पक्ष ने ऐन मौके पर बारात लाने से इनकार कर दिया। नतीजा—घर में मातम पसर गया और एक परिवार की खुशियों पर ग्रहण लग गया।
क्या है पूरा मामला?
बहराइच के जरवल रोड क्षेत्र की ग्राम पंचायत बसहिया पाते निवासी शिवशंकर ने अपनी बेटी के विवाह की तैयारी बड़े ही धूमधाम से की थी। बेटी की शादी बाराबंकी जिले के दरियाबाद लक्ष्मणपुर निवासी चन्द्रकेश उर्फ भूटानी के साथ तय हुई थी। 6 फरवरी को दोनों पक्षों के बुजुर्गों ने मिलकर आपसी सहमति से रिश्ता पक्का किया और शादी की तारीख भी तय कर दी गई।
शिवशंकर के अनुसार, वर पक्ष ने शुरुआत में 1.5 लाख रुपये दहेज की मांग की थी, जो उन्होंने किसी तरह जुटाकर दे दिए। लेकिन शादी पक्की होने के कुछ दिन बाद ही लड़के वालों ने फिर से 50 हजार रुपये अतिरिक्त मांग लिए। इस बार पीड़ित पिता के लिए यह रकम जुटाना मुश्किल हो गया।
शादी के दिन नहीं पहुंची बारात
मई महीने में शादी की तारीख तय थी। सभी रिश्तेदारों को निमंत्रण पत्र भेजे जा चुके थे, खाना-पीना, टेंट, DJ और बाकी सारी व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई थीं। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था, हर कोई जश्न में डूबा था। लेकिन जब बारात पहुंचने का समय आया, तो इंतजार लंबा होता चला गया।
रात भर दुल्हन लाल जोड़े में मंडप के पास बैठी रही, लेकिन बारात नहीं आई। ना कोई सूचना, ना कोई संदेश। एक हंसते-खेलते घर में मायूसी और सदमा पसर गया। रिश्तेदारों के सामने बेइज्जती का सामना करना पड़ा और आर्थिक नुकसान अलग।
थाने में दी गई तहरीर, केस दर्ज
शिवशंकर ने इस मामले की शिकायत जरवलरोड थाने में दी। उन्होंने आरोप लगाया कि दहेज की मांग पूरी न होने पर उनके बेटी की शादी को ठुकरा दिया गया और समाज में उन्हें शर्मसार कर दिया गया।
थाना प्रभारी संतोष सिंह ने पुष्टि करते हुए बताया कि पीड़ित की तहरीर पर बाराबंकी निवासी चन्द्रकेश उर्फ भूटानी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है। मामले की जांच शुरू कर दी गई है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
दहेज का दानव अब भी ज़िंदा है
यह घटना यह बताती है कि समाज में दहेज जैसी कुप्रथा अब भी गहरी जड़ें जमाए हुए है। कानून के बावजूद, आज भी कई लड़कियों के सपने इसलिए चकनाचूर हो जाते हैं क्योंकि उनके माता-पिता 'दहेज' की इस खाई को नहीं भर पाते।
यह सिर्फ एक शादी टूटने की कहानी नहीं, बल्कि एक बेटी के अरमानों, आत्म-सम्मान और भावनाओं के साथ किया गया निर्मम मज़ाक है। ऐसे मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई और समाजिक चेतना दोनों की आवश्यकता है।
समाज को जागना होगा
इस घटना के बाद क्षेत्र में चर्चा का माहौल है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि कब तक बेटियों को इस तरह के अपमान का सामना करना पड़ेगा? कब तक दहेज के नाम पर लड़कियों के साथ अन्याय होता रहेगा?
शिवशंकर जैसे पिता हर गांव-हर शहर में हैं, जो अपनी सीमाओं से बाहर जाकर बेटी की शादी की तैयारी करते हैं। लेकिन कुछ लालची लोग इस रिश्ते को 'सौदे' की तरह देखने लगते हैं।
अब समय है बदलाव का
दहेज प्रथा पर कानून तो बना है, लेकिन जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी। जरूरत है कि ऐसे मामलों में तेज़ी से न्याय मिले, दोषियों को सजा हो और दहेज लेने वालों की सामाजिक स्तर पर बहिष्कार किया जाए।
इस मामले को केवल एक स्थानीय घटना के रूप में नहीं, बल्कि दहेज विरोधी आंदोलन के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए।