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दीक्षा मात्र संस्कार नहीं, जीवन का महा-अनुष्ठान है: मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज

2025-12-17  Baby jain  356 views

ImgResizer_20251217_1638_49243सिलवानी। “दीक्षा लेना और देना महज एक दिन की घटना हो सकती है, लेकिन उसे आजीवन निभाना एक कठिन साधना है। दीक्षा किसी भी साधक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है; यह केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि जीवन को रूपांतरित करने वाला एक महा-अनुष्ठान है।”

ये ओजस्वी विचार जैन धर्म के प्रखर वक्ता और ज्येष्ठ मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज ने सिलवानी में आयोजित पांच क्षुल्लकों के दीक्षा दिवस के अवसर पर व्यक्त किए। इस दौरान पूरा पांडल गुरुभक्ति के रंग में सराबोर नजर आया।

आचार्य विद्यासागर जी की कसौटी पर खरा उतरना ही सौभाग्य

मुनिश्री ने अपने संबोधन में राष्ट्रसंत आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का पुण्य स्मरण करते हुए कहा कि हम सभी परम सौभाग्यशाली हैं जिन्हें गुरुदेव की शरण मिली। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “आज ही के दिन नेमावर की धरा पर 21 क्षुल्लकों की दीक्षा संपन्न हुई थी। गुरुदेव के पास दीक्षा लेने वालों की लंबी कतार थी, वे चाहते तो हजारों मुनि तैयार कर सकते थे, लेकिन वे अपनी विशेष कसौटी पर कसने के बाद ही शिष्य को स्वीकार करते थे। जो उनकी कसौटी पर खरा उतरा, समझो उसका कल्याण हो गया।”

दीक्षा के चार स्तंभ: लेना, देना, निभाना और सार्थक बनाना

मुनिश्री ने दीक्षा के संदर्भ में चार महत्वपूर्ण सूत्र दिए:

 * दीक्षा लेना: जब हृदय में वैराग्य उमड़ता है, तब यह भाव जागता है।

 * दीक्षा देना: गुरु शिष्य की पात्रता देखकर उसे अंगीकार करते हैं।

 * दीक्षा निभाना: यह सबसे कठिन साधना है, जिसे प्रतिपल जीना पड़ता है।

 * सार्थक बनाना: जिस उद्देश्य (मोक्ष मार्ग) के लिए घर छोड़ा, उसे प्राप्त करना।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में ही गुरुदेव ने उन्हें बाल ब्रह्मचारियों को तैयार करने और उनके आध्यात्मिक पालन-पोषण की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसी का परिणाम है कि आज क्षुल्लक आदर्शसागर, समादरसागर, चिद्रूपसागर, स्वभावसागर और सुभगसागर जी मुनिश्री के सानिध्य में अपनी साधना को प्रगाढ़ कर रहे हैं। साथ ही ब्रह्मचारी सारांश और रूपेश भी इसी मार्ग पर अग्रसर हैं।

धार्मिक अनुष्ठानों से महका सिलवानी

कार्यक्रम की शुरुआत आचार्य विद्यासागर जी के चित्र अनावरण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई। भक्तों ने अष्ट द्रव्यों से आचार्य श्री का पूजन किया। इस अवसर पर पांचों क्षुल्लकों को अपने गुरु मुनिश्री प्रमाणसागर जी के पाद प्रक्षालन का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का कुशल संचालन अशोक भैया द्वारा किया गया। इस दौरान मुनिश्री संधानसागर महाराज ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

सियरमऊ की ओर मंगल विहार

प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने जानकारी दी कि दोपहर बाद मुनिसंघ का मंगल विहार सिलवानी से सियरमऊ की ओर हुआ। मुनिसंघ की अगली आहार चर्या 18 दिसंबर को सियरमऊ ग्राम में संपन्न होगी, जिसे लेकर स्थानीय जैन समाज में भारी उत्साह है।


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