
चंदेरी, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर चंदेरी से एक ऐसी हृदयविदारक तस्वीर सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। यहां के श्मशान घाट में व्याप्त बदइंतजामी के चलते एक मृतक के परिजनों को भारी बारिश में तिरपाल के सहारे शव को ढककर अंतिम संस्कार करने के लिए घंटों तक खड़े रहना पड़ा। यह घटना न केवल स्थानीय प्रशासन की असंवेदनशीलता को उजागर करती है, बल्कि मूलभूत सुविधाओं के अभाव में आम आदमी की बेबसी को भी दर्शाती है।
सोमवार को कूंकूं तलैया मुक्तिधाम में उस वक्त मातम और भी गहरा गया, जब भोपाल में बीमारी के चलते दम तोड़ने वाले विनोद बाल्मिक का अंतिम संस्कार करने उनके परिजन पहुंचे। अपनों को खोने का दुख तो था ही, लेकिन श्मशान घाट की दुर्दशा देखकर उनका दर्द और बढ़ गया।
बारिश बनी बाधा, तिरपाल बना सहारा
दोपहर करीब एक बजे जब परिजन अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे, तभी अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। श्मशान घाट पर पहले से मौजूद जर्जर टीन शेड भी पानी रोकने में नाकाम साबित हुआ और पानी सीधे चिता पर गिरने लगा। बारिश के कारण चिता पर रखी लकड़ियां और कंडे पूरी तरह से भीग गए, जिससे आग जलाना मुश्किल हो गया।
अपनों के वियोग में डूबे परिजनों के लिए यह स्थिति असहनीय थी। बेबसी और निराशा के बीच, मृतक के कुछ रिश्तेदार तुरंत बाजार की ओर दौड़े और तिरपाल लेकर आए। भारी बारिश में खुद भीगते हुए उन्होंने तिरपाल को चिता के ऊपर फैलाया और उसे हाथों से पकड़कर खड़े रहे, ताकि शव बारिश से बचा रहे। लगभग आधे घंटे तक वे इसी तरह तिरपाल थामे खड़े रहे, मानों प्रकृति भी उनके दुख में शामिल हो गई हो। जब बारिश थोड़ी धीमी हुई, तब कहीं जाकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हो सकी।
सालों से बदहाल श्मशान घाट, प्रशासन बेखबर
स्थानीय लोगों का कहना है कि चंदेरी के इस एकमात्र श्मशान घाट की हालत सालों से खस्ता है। यहां न तो पक्की छत है, न ही बैठने के लिए कोई उचित व्यवस्था। बरसात के मौसम में तो स्थिति और भी खराब हो जाती है, लेकिन स्थानीय प्रशासन इस ओर ध्यान देने की जहमत तक नहीं उठाता। चंदेरी, जो अपनी ऐतिहासिक धरोहर और विश्वव्यापी पहचान के लिए जाना जाता है, वहां के श्मशान घाट की ऐसी बदहाली देखकर हर नागरिक शर्मिंदा है। विनोद बाल्मिक का अंतिम संस्कार तो जैसे-तैसे संपन्न हो गया, लेकिन उनके परिजनों के मन में यह दुखद अनुभव हमेशा के लिए रह जाएगा।
प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल
नगरपालिका के अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से कई बार श्मशान घाट की स्थिति सुधारने की मांग की गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। अब सवाल यह उठता है कि क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की नींद तभी खुलेगी जब उनके अपने परिजन ऐसी ही तकलीफदेह स्थिति का सामना करेंगे? क्या किसी की मौत का इंतजार किया जा रहा है ताकि व्यवस्था सुधरे?
चंदेरी में श्मशान घाट की यह दुर्दशा विकास के दावों की पोल खोलती है। यह घटना दिखाती है कि कैसे बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण आम आदमी को कितना कष्ट झेलना पड़ता है। उम्मीद है कि इस घटना के बाद प्रशासन जागेगा और जल्द ही श्मशान घाट की व्यवस्थाओं को सुधारेगा, ताकि भविष्य में किसी और को इस तरह की त्रासदी का सामना न करना पड़े।