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शक्ति, सुरक्षा और शांति का महामंत्र: आचार्य प्रमाण सागर ने बताए 'णमोकार' की अद्भुत विशेषताएँ

2025-09-30  Editor Shubham Jain  842 views

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जैन धर्म का णमोकार महामंत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच और जीवन के हर पल का संबल है। यह उद्गार हैं परम पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के, जिन्होंने इस अनादि सिद्ध मंत्र की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'णमोकार' को दुनिया के अन्य मंत्रों से अलग क्या बनाता है—यह गुणवाचक है, इसका कोई देवता नहीं।

मुनि श्री ने कहा कि आप णमोकार महामंत्र के किसी भी पद का उच्चारण करें, वह तत्काल मंत्र बनकर आपको सुरक्षा प्रदान करता है। यह मंत्र हमारे जीवन की शुरुआत से लेकर अंत तक हमारा संरक्षण करता है।

क्यों 'णमोकार' है सबसे निराला?

मुनि श्री प्रमाण सागर ने णमोकार महामंत्र की सबसे बड़ी और मूलभूत विशेषता बताते हुए कहा कि संसार में जितने भी मंत्र हैं, उनका कोई न कोई आराध्य देव या देवी होता है, लेकिन "णमोकार महामंत्र" ही एक ऐसा मंत्र है जिसका कोई देवता नहीं है। इसके पाँचों पद—अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, एवं साधु—किसी व्यक्ति विशेष के वाचक नहीं, बल्कि गुणों के वाचक हैं। यह गुणों की वंदना है, किसी व्यक्ति की नहीं।

यह मंत्र अनादि सिद्ध मंत्र है। इसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है; आपको केवल इसे जपने की देरी है। मुनि श्री ने इसे शांति प्रदाता और पौष्टिक मंत्र बताया, जो कभी किसी का अहित नहीं कर सकता।

नकारात्मक शक्तियों पर अचूक प्रहार

एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात पर जोर देते हुए मुनि श्री ने कहा कि यह मंत्र कभी भी मारण, उच्चाटन या विद्वेष जैसी नकारात्मक क्रियाओं में काम नहीं करता, लेकिन यदि कोई आपके ऊपर इन मारक विद्याओं का उपयोग करता है, तो यह उससे आपका अचूक बचाव करता है। यह मंत्र स्वयं में इतना सकारात्मक है कि यह किसी भी नकारात्मक ऊर्जा को अपने समीप फटकने नहीं देता।

इस संदर्भ में, मुनि श्री ने एक रोमांचक सत्य घटना भी सुनाई।

एक बार एक जैन पंडित जी रेल यात्रा कर रहे थे। उसी ट्रेन में एक मारक विद्या में सिद्ध बाबा भी थे। बाबा ने अपनी शक्ति से सभी यात्रियों को डराया और धमकाया, जिससे वे सब उनके वश में आ गए। लेकिन जैन पंडित जी ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया। इस पर क्रोधित होकर बाबा ने उन पर अपनी मारक विद्या का प्रयोग किया।

पंडित जी मन ही मन णमोकार महामंत्र का स्मरण कर रहे थे। बाबा की मारक विद्या का उन पर कोई असर नहीं हुआ, उल्टा वह सिद्ध बाबा पसीना-पसीना हो गया। थोड़ी देर बाद वह उठा और शौचालय (वॉशरूम) गया। जब वह वापस नहीं लौटा, तो यात्रियों ने देखा कि वह शौचालय में ही ढेर पड़ा था।

मुनि श्री ने इसका कारण बताते हुए कहा कि मारक विद्या की यह प्रकृति होती है कि एक बार जब वह निकल जाती है और यदि वह सामने वाले के प्राण नहीं ले पाती, तो वह उसी व्यक्ति के प्राण ले लेती है जिसने उस विद्या का प्रयोग किया है। णमोकार महामंत्र ने पंडित जी के चारों ओर ऐसा अभेद्य सुरक्षा कवच बना दिया था कि मारक विद्या को लौटने के लिए विवश होना पड़ा।

जपने की स्वतंत्रता और सरलता

णमोकार महामंत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जपने की स्वतंत्रता है। मुनि श्री प्रमाण सागर ने स्पष्ट किया कि इस मंत्र को किसी भी समय, किसी भी अवस्था में, तथा किसी भी क्रम में जपा जा सकता है। यह आनुपूर्वी (एक निश्चित क्रम) से बंधा हुआ नहीं है। इसे कहीं भी पढ़ा जा सकता है।

यही नहीं, मुनि श्री ने इसकी परम सरलता को रेखांकित करते हुए बताया कि इसे केवल शब्द रूप में अर्थात अ, सि, आ, उ, सा (अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) का उच्चारण करने मात्र से भी संपूर्ण णमोकार महामंत्र का उच्चारण हो जाता है। यह इसकी सर्वसुलभता को सिद्ध करता है।

आगामी श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की तैयारी

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के मुखारविंद से आगामी 4 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक एक विशेष आराधना का आयोजन होगा। यह आराधना संस्कृत भाषा में लिपिबद्ध श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की होगी, जिसका जप मुनि श्री द्वारा प्राकृत भाषा में लिपिबद्ध बीजाक्षरों से युक्त मंत्रों के साथ प्रारंभ होगा।

इस चातुर्मास की यह वृहद और अंतिम पूजा होगी। इसकी संपूर्ण तैयारियां हो चुकी हैं, जिसमें संपूर्ण भारत के श्रावक श्रेष्ठी भाग लेंगे। इस विधान में विधानाचार्य के रूप में बाल ब्रह्मचारी अशोक भैयाजी एवं अभय भैयाजी अपनी सेवाएँ देंगे।

णमोकार महामंत्र वास्तव में जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है—एक ऐसा मंत्र जो हमें भय से मुक्ति, गुणों से जुड़ाव और परम शांति प्रदान करता है।


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