
विदिशा, 5 जून 2025
राज्य सरकार की सेवाओं में पारदर्शिता और नियमों के अनुपालन को लेकर एक अहम फैसला सामने आया है। मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में एक व्यक्ति को जन्मतिथि में बदलाव कर नौकरी प्राप्त करने के मामले में न्यायालय ने दोषी करार देते हुए 5 साल के सश्रम कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। यह निर्णय विशेष न्यायालय लोकायुक्त द्वारा सुनाया गया।
क्या है मामला?
यह पूरा मामला लगभग 34 वर्ष पुराना है। संबंधित व्यक्ति ने वर्ष 1990 में मध्यप्रदेश शासन की आयुर्वेद सेवाओं में बतौर आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर (Doctor) के पद पर नियुक्ति प्राप्त की थी। नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों में उसने अपनी जन्मतिथि बदलकर खुद को 13 महीने और 19 दिन छोटा दिखाया, ताकि वह आयुसीमा की पात्रता में आ सके।
असल में उसकी वास्तविक जन्मतिथि 12 जुलाई 1956 थी, लेकिन नौकरी के लिए प्रस्तुत शैक्षणिक और शासकीय दस्तावेजों में इसे 31 जुलाई 1957 दर्शाया गया। इस बदलाव की वजह से वह नौकरी की पात्रता में शामिल हो गया, जबकि वास्तविक जन्मतिथि के आधार पर वह तय सीमा से बाहर हो चुका था।
कैसे हुआ फर्जीवाड़े का खुलासा?
यह मामला कई वर्षों तक दबा रहा और संबंधित अधिकारी सेवा में बने रहे। लेकिन वर्ष 2016 में किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा इस फर्जीवाड़े की शिकायत की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि संबंधित डॉक्टर ने जन्मतिथि में हेराफेरी कर शासन को धोखा देकर नौकरी हासिल की है।
शिकायत के आधार पर लोकायुक्त संगठन ने जांच शुरू की। जांच के दौरान संबंधित अधिकारी के मूल शैक्षणिक दस्तावेज, हाईस्कूल प्रमाण पत्र, सेवा पुस्तिका तथा अन्य अभिलेखों का परीक्षण किया गया। दस्तावेजों के मिलान में स्पष्ट हुआ कि अधिकारी ने हाईस्कूल प्रमाण पत्र में अंकित जन्मतिथि के बजाय सेवा में प्रवेश के लिए एक अलग तिथि प्रस्तुत की थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायालय, विदिशा ने 54 पृष्ठों के निर्णय में इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर आर्थिक और प्रशासनिक अनियमितता बताया। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि सरकारी सेवा में नियुक्ति एक संवेदनशील प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक दस्तावेज की सत्यता आवश्यक होती है। जन्मतिथि जैसे आधारभूत दस्तावेज में जानबूझकर की गई हेराफेरी धोखाधड़ी के अंतर्गत आती है।
न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी से जुड़े दस्तावेज तैयार करना), 468 (धोखाधड़ी के लिए जालसाजी) और 471 (जालसाजी दस्तावेज का प्रयोग) के तहत दोषी पाया। साथ ही आरोपी को पांच वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।
सरकारी तंत्र में पारदर्शिता का संदेश
यह फैसला शासन और प्रशासनिक तंत्र के लिए एक संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि सरकारी नौकरी पाने के लिए यदि कोई अभ्यर्थी झूठ या फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेता है, तो भले ही वह कई वर्षों तक बचा रहे, लेकिन एक दिन कानून उसे पकड़ ही लेता है। इस मामले में भी संबंधित अधिकारी ने 1990 से लेकर 2016 तक की सेवा बिना किसी अवरोध के दी, लेकिन 2016 में शिकायत और जांच के बाद उसकी सच्चाई सामने आ गई।
क्या हो सकती हैं अन्य कार्रवाइयां?
विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के मामलों में दोष सिद्ध होने के बाद आरोपी से सरकार वेतन और सेवाकाल के अन्य लाभों की वसूली भी कर सकती है। इसके अलावा यदि आरोपी अब भी सेवा में होता, तो उसकी बर्खास्तगी भी संभव होती। हालांकि इस मामले में आरोपी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुका है।
यह मामला उन सभी अभ्यर्थियों और कर्मचारियों के लिए सबक है जो शासकीय सेवा में प्रवेश पाने या सेवा में बने रहने के लिए गलत दस्तावेजों का सहारा लेते हैं। इस फैसले से स्पष्ट है कि न्यायिक प्रक्रिया भले ही समय ले, लेकिन सत्य की पुष्टि अंततः होती है। सरकारी नौकरी के लिए दस्तावेजों में पारदर्शिता और सत्यता अनिवार्य है, और किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी अंततः पकड़ में आ ही जाती है।