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“सप्ताह भर का प्यार, और फिर सूनापन का उपहार: दुल्हन निकली 'लुटेरी क्वीन'”

2025-06-07  Amit raikwar  1,084 views

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उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी ज़िले से एक बार फिर वही पुराना मगर ‘नया-नया सा’ मामला सामने आया है, जिसमें प्यार का वादा तो हुआ था सात जन्मों तक साथ निभाने का, लेकिन निभाया गया केवल सात दिनों का ड्रामा।

थाना फूलबेहड़ क्षेत्र के मुड़िया खुर्द गांव के राजेंद्र प्रसाद लोधी, जिन्हें ज़िंदगी में दोबारा ‘हमसफर’ की ज़रूरत थी, अब शायद 'हमें सफर पर क्यों निकले' जैसा कुछ गुनगुना रहे होंगे। वजह? उनकी नवविवाहित पत्नी, जो आई थी साड़ी में शर्माते हुए और गई चुपचाप चप्पलें छोड़ते हुए — मगर साथ में ले गई घर की नकदी और जेवर भी।

शादी हुई थी, मगर 'सद्भावना' से नहीं, 'साजिश' से

राजेंद्र प्रसाद की पहली पत्नी का देहांत वर्षों पहले हो गया था। तीन बच्चों के साथ वे अकेले जीवन काट रहे थे। शायद बच्चों को ‘मां का प्यार’ और खुद को ‘सात फेरों का सहारा’ देने की मंशा से उन्होंने दूसरी शादी का फैसला किया। गांव की एक परिचित महिला की मदद से, उन्होंने लखीमपुर की रहने वाली एक महिला से विवाह कर लिया।

पहले सप्ताह में सब कुछ वैसा ही चला जैसा सास-बहू सीरियल के पहले एपिसोड में होता है — मधुरता, मिठास, और थोड़ा-बहुत दिखावा। बच्चों को मां का स्नेह मिला, राजेंद्र को जीवनसाथी का सहारा, और गांववालों को नई चटपटी चर्चा।

लेकिन, आठवें दिन जो हुआ, उसने साबित कर दिया कि यह विवाह सिर्फ ‘प्रेम का पुल’ नहीं बल्कि ‘लूट का जाल’ था।

खिला प्यार में नशा, और ले गई सब कुछ

गुरुवार की रात को जब पूरा परिवार भोजन कर रहा था, किसी को अंदाज़ा नहीं था कि रोटी के साथ 'नशा' भी परोसा जा रहा है। नई नवेली दुल्हन ने खाने में नशीला पदार्थ मिलाकर सबको बेहोश कर दिया। जब सबको होश आया, तो घर से 'घरवाली' ही गायब थी — और उसके साथ गायब थे घर में रखे जेवर और नकदी भी।

यह 'हनीमून' नहीं, 'लूट मून' साबित हुआ।

पुलिस बोली, ‘हमें कुछ पता नहीं’

फूलबेहड़ थाना प्रभारी अवधराज सिंह सेंगर ने बयान दिया कि अभी तक इस मामले में कोई तहरीर प्राप्त नहीं हुई है। यानी, प्रशासन की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में वैसी ही है जैसी बॉलीवुड फिल्मों में एक्स्ट्रा किरदारों की — चुपचाप खड़े रहो, और ज़रूरत पड़ी तो एक डायलॉग बोल दो।

अब सवाल उठता है कि राजेंद्र जी ने अभी तक पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज कराई। क्या उन्हें उम्मीद है कि दुल्हन लौटकर कहेगी, "सॉरी जी, मज़ाक था"? या फिर वो इस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे हैं?

गांव में गर्म है माहौल, ठंडी पड़ी हैं उम्मीदें

गांव में चर्चा जोरों पर है। कोई कह रहा है कि राजेंद्र ने जल्दबाज़ी कर दी, तो कोई कह रहा है कि ये ‘लुटेरी दुल्हन गैंग’ की चाल हो सकती है। सोशल मीडिया पर भी लोग कह रहे हैं कि अब शादी करने से पहले आधार कार्ड ही नहीं, ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ भी लेना चाहिए।

कुछ स्थानीय महिलाएं तो यह भी कहती पाई गईं — “हम तो शुरू से कह रहे थे कि कुछ गड़बड़ है। कौन दुल्हन आती है और आते ही जेवरों की अलमारी देखती है?”

व्यंग्यात्मक सार

यह घटना न सिर्फ एक परिवार की तकलीफ है, बल्कि समाज के उस अंधे विश्वास का आइना भी है, जिसमें किसी को बस 'साथ' चाहिए, चाहे वो साथ ‘सच’ का हो या ‘साजिश’ का।

राजेंद्र प्रसाद ने जो किया, वो प्रेम का प्रयास था — लेकिन सामनेवाली का उद्देश्य कुछ और ही निकला। यह कहानी हमें बताती है कि प्यार के नाम पर लुटेरी स्कीम भी लॉन्च हो सकती है — बिना लाइसेंस, बिना वॉरनिंग।

शायद अब समय आ गया है जब 'शादी से पहले' आधार, पैन, राशन कार्ड के साथ-साथ थोड़ी पड़ताल भी होनी चाहिए। और हां, अगर कोई दुल्हन एक ही हफ्ते में बच्चों को 'ज्यादा प्यारी मम्मी' और पति को 'सबसे अच्छा पति' कहने लगे, तो थोड़ा सतर्क रहिए — कहीं वो 'सबसे अच्छा मौका' न ढूंढ रही हो!

लखीमपुर की यह घटना सतर्कता की एक सशक्त मिसाल है। भावनाओं की जगह विवेक को प्राथमिकता देना आवश्यक है, खासकर तब, जब मामला जीवन भर के रिश्तों से जुड़ा हो। राजेंद्र जी की कहानी भले ही फिलहाल व्यंग्य का विषय हो, लेकिन यह एक गम्भीर सामाजिक चेतावनी भी है: प्यार की भूख हो, लेकिन 'लूट' की प्यास से बचें।


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