
मुरैना: मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने प्रशासन और जनता दोनों को हिला कर रख दिया। पटवारी ब्रजेश कुमार पर आरोप था कि उन्होंने नामांतरण के काम के लिए 5 हजार रुपए की रिश्वत मांगी थी। लोकायुक्त ग्वालियर की टीम ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ने के लिए पूरी योजना बनाई थी, लेकिन घटनाक्रम ऐसा उलझा कि रिश्वत के नोट अचानक गायब हो गए।
रिश्वत की शुरुआत: फरियादी की शिकायत
कैलारस निवासी रोहित सिंह बादल ने खुमानी पुरा रोड पर एक प्लॉट खरीदा था और नामांतरण के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था। पटवारी ब्रजेश कुमार से संपर्क करने पर उन्होंने काम के बदले 5 हजार रुपए मांगे। इसमें से 1 हजार रुपए पहले ही दिए जा चुके थे। बाकी के 4 हजार रुपए के लिए रोहित सिंह ने लोकायुक्त से संपर्क किया।
लोकायुक्त का जाल
लोकायुक्त ग्वालियर की 15 सदस्यीय टीम ने कैलारस में पटवारी को पकड़ने के लिए सादे कपड़ों में तहसील के आसपास तैनाती की। फरियादी को केमिकल लगे 4 हजार रुपए देकर पटवारी तक पहुंचने की योजना बनाई गई। जैसे ही रोहित सिंह पैसे लेकर तहसील पहुंचे, पटवारी ने उन्हें देखकर इशारा किया और पैसे अपने प्राइवेट सहयोगी, राजू श्रीवास, को देने के लिए कहा।
ड्रामा: नोट लेकर भागा व्यक्ति
पैसे देते ही लोकायुक्त टीम ने तुरंत कार्रवाई की और पटवारी ब्रजेश कुमार को पकड़ने की कोशिश की। लेकिन तभी पटवारी ने शोर मचा दिया। इस हंगामे का फायदा उठाकर राजू श्रीवास चार हजार रुपए लेकर मौके से फरार हो गया।
फरारी और छानबीन
लोकायुक्त टीम और कैलारस पुलिस ने तुरंत पीछा किया, लेकिन रिश्वत की रकम गायब हो गई। पुलिस अब राजू श्रीवास की तलाश कर रही है। पटवारी ब्रजेश कुमार को हिरासत में ले लिया गया है और उनसे पूछताछ जारी है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल
यह घटना न केवल भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें दिखाती है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सुधार की मांग भी उठाती है। ऐसे मामलों में सटीक योजना के बावजूद दोषियों का बच निकलना चिंताजनक है।
मुरैना के इस हाई-ड्रामा मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक भ्रष्टाचार के ऐसे मामले आम जनता के लिए सिरदर्द बने रहेंगे?