
कुरावर/भोपाल: क्या पुलिस अब अपराधियों के साथ मिल गई है? यह सवाल तब उठता है जब देशभर के पत्रकारों के साथ हो रही ज्यादती के बीच कुरावर में एक पत्रकार को लूट और मारपीट का शिकार होना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने के बजाय पीड़ित पत्रकार को ही घंटों थाने में बिठाए रखा।
नेशनल कॉन्फ्रेंस से लौट रहे पत्रकार पर हमला
चेन्नई में हुए भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन से लौट रहे हरिभूमि के पत्रकार मनोज मेवाड़े और उनके दो साथी सोमवार रात करीब 1:30 बजे कुरावर पहुंचे। जैसे ही वे अपने घर की ओर जा रहे थे, ब्रिज के नीचे अज्ञात शराबी और असामाजिक तत्वों ने उन्हें रोका। हमलावरों ने न केवल उनका मोबाइल छीना, बल्कि उनके साथ गाली-गलौज करते हुए जमकर मारपीट भी की।
आरोपियों को पकड़ा, फिर भी पुलिस ने नहीं की कार्रवाई
चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनकर मेवाड़े के दो साथी मौके पर पहुंचे और दोनों हमलावरों को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। लेकिन, "देशभक्ति जनसेवा" का नारा देने वाली कुरावर पुलिस ने यहां भी अपना रंग दिखाया। दूसरे दिन शाम तक न तो आरोपियों का मेडिकल कराया गया और न ही कोई रिपोर्ट लिखी गई। उलटा, एएसआई प्रदीप बैरागी ने पत्रकार मनोज मेवाड़े को ही घंटों थाने में बिठाए रखा और उनकी शिकायत तक नहीं ली।
टीआई ने नहीं उठाया फोन, क्यों?
इस पूरी घटना के दौरान, थाना प्रभारी संगीता शर्मा को कई बार फोन किया गया, लेकिन उन्होंने एक भी फोन नहीं उठाया। पत्रकारों के साथ हुई इस घटना ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या पुलिस पत्रकारों को सुरक्षा देने के बजाय अपराधियों का साथ दे रही है? आखिर किस दबाव में पुलिस ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की? यह सवाल सिर्फ कुरावर के नहीं, बल्कि पूरे देश के पत्रकारों के मन में है।