मैहर (रामनगर): मध्यप्रदेश के मैहर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे। क्या कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु के 4 साल बाद भी व्यापार कर सकता है? क्या कोई स्वर्ग से आकर सरकारी बिलों पर हस्ताक्षर कर सकता है? जनपद पंचायत रामनगर के एक पंचायत सचिव ने अपने पिता की 'आत्मा' को शायद इसीलिए आजाद नहीं होने दिया, क्योंकि उनसे अभी और पैसे कमाने बाकी थे।
मृत्यु के बाद भी जारी रहा व्यापार का ‘खेल’
मामला जनपद पंचायत रामनगर के पूर्वी क्षेत्र की ग्राम पंचायतों का है। यहाँ के गोविंदपुर निवासी बद्री प्रसाद का निधन 05 मई 2021 को 64 वर्ष की आयु में हो चुका है। बद्री प्रसाद 'बद्रिका ट्रेडर्स' नाम की फर्म के संचालक और प्रोपराइटर थे। नियमतः प्रोपराइटर की मृत्यु के बाद फर्म का संचालन या तो बंद हो जाना चाहिए था या उसका वैधानिक उत्तराधिकारी नियुक्त होना चाहिए था।
लेकिन यहाँ तो कहानी ही फिल्मी है! बद्री प्रसाद की मौत के बाद भी उनकी फर्म 'बद्रिका ट्रेडर्स' ग्राम पंचायतों में धड़ल्ले से मटेरियल सप्लाई करती रही। सरकारी रिकॉर्ड और ग्राम पंचायतों में लगे बिल चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि बद्री प्रसाद मरने के बाद भी पंचायतों में सामान पहुँचा रहे थे और समय पर भुगतान भी ले रहे थे।
पुत्र सचिव और पिता 'सप्लायर': भ्रष्टाचार की अनोखी जुगलबंदी
इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड उनके पुत्र अरुण आजाद द्विवेदी बताए जा रहे हैं, जो स्वयं पंचायत सचिव के पद पर कार्यरत हैं। आरोप है कि सचिव पुत्र ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए मृतक पिता के नाम पर बनी फर्म से लाखों रुपये का वारा-न्याय किया।
चर्चा है कि बद्री प्रसाद मानो 'स्वर्ग' से धरती पर सिर्फ इसलिए उतरते थे ताकि वे मटेरियल सप्लाई कर सकें और अपनी मेहनत की कमाई चुपचाप अपने सचिव पुत्र अरुण आजाद को सौंपकर वापस लौट सकें। जनपद पंचायत रामनगर भ्रष्टाचार का ऐसा अनूठा उदाहरण बन गया है, जहाँ फाइलों में मुर्दे भी व्यापार कर रहे हैं।
क्या सिस्टम सो रहा है या मिलीभगत है?
सवाल यह उठता है कि जब पंचायत सचिव स्वयं अपने मृत पिता के नाम पर व्यापार करवा रहे थे, तो जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या किसी ने बिलों की जांच करना जरूरी नहीं समझा? जब एक सचिव अपने मृत पिता को नहीं छोड़ रहा, तो जीवित ग्रामीणों के हक पर वह क्या डाका डाल रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन के 'विशेष तंत्र' और जांच एजेंसियां इस खुली किताब के पन्नों को कब पलटती हैं। क्या इस सस्पेंस और भ्रष्टाचार की कहानी लिखने वाले सचिव पर कड़ी कार्रवाई होगी, या फिर यह फाइल भी सरकारी बस्ते में दबकर रह जाएगी?