
भिंड। मध्य प्रदेश के भिंड जिले की नगर पालिका भ्रष्टाचार के दलदल में धँस चुकी है। वर्तमान मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) यशवंत वर्मा के कार्यकाल में यह संस्था अब जनता की सेवा कम और व्यक्तिगत जेब भरने का अड्डा ज्यादा बन गई है। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी और सामने आए दस्तावेज़ों के अनुसार, फर्जी टेंडर, काल्पनिक कर्मचारियों की भर्ती, और विकास कार्यों में भारी कमीशनखोरी का एक संगठित रैकेट यहाँ सक्रिय है। नगर पालिका का हर विभाग इस 'कमीशन कल्चर' की भेंट चढ़ चुका है।
जल शाखा में सबसे बड़ा 'खेल': बिना टेंडर करोड़ों का काम
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा खेल नगर पालिका की जल शाखा में खेला जा रहा है। यहाँ करोड़ों रुपये के कार्य न सिर्फ बिना किसी विधिवत स्वीकृति के किए गए, बल्कि टेंडर प्रक्रिया को भी पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। नियमों को ताक पर रखने के लिए, बड़े-बड़े कार्यों को जानबूझकर छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटा गया ताकि उन्हें आसानी से पास कराया जा सके। चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ कर्मचारियों ने अपने ही परिवार के सदस्यों के नाम पर फर्जी फर्म बनाकर करोड़ों के ठेके लिए। सीएमओ यशवंत वर्मा को इन अनियमितताओं की पूरी जानकारी होने के बावजूद, उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
'काल्पनिक' कर्मचारियों की भर्ती का रेट कार्ड
नगर पालिका की विभिन्न शाखाओं में फर्जी कर्मचारियों की भर्ती का एक बड़ा स्कैम सामने आया है। रिकॉर्ड में दर्ज ये कर्मचारी कभी कार्यालय आते ही नहीं, लेकिन हर महीने उनकी तनख्वाह उनके खातों में पहुँचती रही। सूत्रों के मुताबिक, एक 'काल्पनिक' कर्मचारी की भर्ती के लिए 1 लाख से सवा लाख रुपये तक का रेट तय था। यह गोरखधंधा सीएमओ के संरक्षण में बेखौफ चलता रहा। सीएमओ के एक कथन के अनुसार, नगरीय प्रशासन में अधिकारियों की पोस्टिंग भी 'पैसा देकर' तय होती है, जो उच्च-स्तर पर फैले भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
विकास कार्यों पर 'कमीशन' का ग्रहण: अधूरे प्रोजेक्ट
विकास कार्यों पर कमीशनखोरी का इतना भारी प्रहार हुआ है कि नगर पालिका के ठेकेदारों से खुलेआम मोटी रिश्वत माँगी जा रही है। केवल वही ठेकेदार भुगतान पाते हैं जिन्होंने सीएमओ और उनके गुर्गों को भारी कमीशन दिया। जिन ईमानदार ठेकेदारों ने कमीशन नहीं दिया, उनके लाखों के भुगतान महीनों से अटके पड़े हैं। इस कमीशनखोरी का सीधा असर शहर के विकास पर पड़ा है: स्वच्छता मिशन, अमृत योजना और मुख्यमंत्री अधोसंरचना योजना जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट या तो आधे-अधूरे पड़े हैं या उनमें बेहद घटिया गुणवत्ता का काम किया गया है।
वित्तीय अधिकारों का दुरुपयोग: ऑफलाइन टेंडर से गबन
सीएमओ यशवंत वर्मा पर 5 लाख रुपये तक की खरीद-फरोख्त और मरम्मत कार्यों को ऑफलाइन टेंडर के माध्यम से कराने का गंभीर आरोप है। ऑनलाइन पारदर्शिता को दरकिनार कर, उन्होंने नेम पोर्टल (GEM Portal) के ज़रिए अपने पुत्र के नाम से जुड़ी फर्मों को ब्लैक आउट और वाहन मरम्मत जैसे कार्य दिए, जिनमें करोड़ों के गबन की आशंका है। स्वास्थ्य शाखा में केवल वाहन मरम्मत पर 5 लाख रुपये खर्च दिखाकर, ऑफलाइन नोटशीट से भुगतान करना इस भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
शिकायतें दबीं, जनता का विश्वास टूटा
स्थानीय शिकायतकर्ता पवन कुमार शर्मा ने इस पूरे भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और संयुक्त संचालक नगरीय प्रशासन, ग्वालियर तक शिकायतें भेजीं। लेकिन, हर बार मामले को दबा दिया गया और कोई ठोस जांच नहीं हुई। भिंड के बुद्धिजीवी वर्ग का सवाल है कि जब भ्रष्टाचार की फाइलें खुद सत्ता और अफसरों के संरक्षण में पनप रही हों, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? भिंड नगर पालिका का यह हाल मध्यप्रदेश में सुशासन के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।