देवास। मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की असलियत एक बार फिर कटघरे में है। सरकार भले ही करोड़ों रुपये के बजट और 'हाईटेक' चिकित्सा सुविधाओं के दावे करे, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। देवास जिले से आई एक तस्वीर ने न केवल प्रशासन को शर्मसार किया है, बल्कि मानवता को भी झकझोर कर रख दिया है। यहाँ एक मजबूर पति अपनी लकवाग्रस्त पत्नी को जिला अस्पताल से ठेला गाड़ी पर घर ले जाने को मजबूर हो गया।
एम्बुलेंस के लिए भटकता रहा, पर नहीं पसीजा दिल
मामला देवास के नवदुर्गा नगर का है। यहाँ के निवासी गोपाल बाघले की पत्नी गीता बाई लंबे समय से लकवे की बीमारी से जूझ रही हैं। गोपाल अपनी पत्नी के इलाज की उम्मीद में उन्हें जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। लेकिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद असली संघर्ष शुरू हुआ। गोपाल ने अपनी बीमार पत्नी को घर ले जाने के लिए कई बार एम्बुलेंस की गुहार लगाई, लेकिन घंटों इंतज़ार के बाद भी उन्हें कोई वाहन मुहैया नहीं कराया गया।
गरीबी और सिस्टम का दोहरा वार
गोपाल के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह प्राइवेट एम्बुलेंस या वाहन का खर्च उठा सके। जब सरकारी सिस्टम ने हाथ खड़े कर दिए और जेब खाली मिली, तो गोपाल ने एक हाथ ठेला किराए पर लिया (या जुगाड़ किया)। उन्होंने अपनी बीमार और बेबस पत्नी को उस खुले ठेले पर लेटाया और शहर की सड़कों पर उसे धक्का देते हुए घर की ओर चल दिए। जिसने भी यह मंजर देखा, उसकी आंखें भर आईं।
समाजसेवी ने बढ़ाया मदद का हाथ
बीच सड़क पर जब समाजसेवी सुमेर सिंह की नज़र इस लाचार पति पर पड़ी, तो उनसे यह दुख देखा नहीं गया। उन्होंने तुरंत गोपाल को रोककर उनका हाल जाना और आर्थिक मदद के रूप में 1000 रुपये दिए। सुमेर सिंह ने बताया कि यह दृश्य देखकर सिस्टम की नाकामी साफ़ झलक रही थी।
‘साहब, गरीबों की कोई नहीं सुनता’
अपनी व्यथा सुनाते हुए गोपाल की आंखों से आंसू छलक पड़े। सिसकते हुए गोपाल ने बताया, “साहब, हम गरीबों की कोई सुनने वाला नहीं है। पत्नी को लकवा है, अस्पताल में भी बस दवाई देकर घर जाने को कह दिया गया। एम्बुलेंस मांगी तो मिली नहीं, अब इस ठेले के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था।”
कागजों पर 'सुशासन', सड़कों पर ‘बेबसी’
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार स्वास्थ्य विभाग को चुस्त-दुरुस्त करने के निर्देश दे रहे हैं, लेकिन देवास की यह घटना बताती है कि निचले स्तर पर स्थिति कितनी भयावह है। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी एम्बुलेंस सिर्फ रसूखदारों के लिए हैं? एक गरीब मरीज के लिए सिस्टम इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है?
अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद प्रशासन जांच की बात करता है और किसी छोटे कर्मचारी पर गाज गिराकर पल्ला झाड़ लेता है। लेकिन क्या गोपाल जैसे हजारों लोगों का सिस्टम पर भरोसा कभी वापस लौट पाएगा? यह घटना "सबका साथ, सबका विकास" के नारों के बीच एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।