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मनुष्य जीवन सबसे बड़ा 'सौभाग्य': मुनि श्री प्रमाण सागर ने बताया कैसे बदलें 'भाग्य' को 'सौभाग्य' में

2025-09-17  Editor Shubham Jain  332 views

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बाबड़िया कला (भोपाल)। भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं, लेकिन हमें यह नहीं पता कि सबसे बड़ा सौभाग्य तो हमारे पास पहले से ही है - यह है मनुष्य जीवन। यही बात जैन मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने बाबड़िया कला में आयोजित धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि "नरभव की प्राप्ती इस लोक में सबसे अधिक दुर्लभ है।" इस एक पंक्ति ने ही पूरी धर्मसभा में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया। मुनि श्री ने 'भाग्य', 'सौभाग्य', 'हथभाग्य' और 'दुर्भाग्य' के गूढ़ रहस्यों को बेहद सरल और प्रभावशाली ढंग से समझाया, जिससे हर कोई अपने जीवन को नए सिरे से देखने को मजबूर हो गया।

भाग्य और पुरुषार्थ का अनोखा संगम

मुनि श्री ने कहा कि 'योग' मिलना भाग्य है, लेकिन उस योग का सही उपयोग करना ही 'सौभाग्य' है। योग का दुरुपयोग करना 'हथभाग्य' है और योग का सही प्रयोग न कर पाना 'दुर्भाग्य' है। उन्होंने बाबड़िया कला के लोगों को बताया कि उनका यह पुण्य और सौभाग्य ही है कि उन्हें तीसरी बार इस तरह का आध्यात्मिक 'योग' मिला है। उन्होंने यह भी समझाया कि परीक्षा से वही डरते हैं जिनकी तैयारी कम होती है, जो अच्छी पढ़ाई करते हैं, वे तो कहते हैं कि आप जैसी चाहे परीक्षा ले लो। इसी तरह, जिसने पूर्वजन्म में अच्छे कर्म किए हैं, वही इस जन्म में अनुकूल संयोगों को प्राप्त करता है। यह सब भगवान से कोई 'पूर्व-कॉन्टैक्ट' नहीं है, बल्कि यह हमारे अपने पूर्व पुरुषार्थ का फल है।

'दुर्लभ' मनुष्य जीवन का सही उपयोग

मुनि श्री प्रमाण सागर ने वैज्ञानिक और शास्त्रीय दोनों तरीकों से समझाया कि मनुष्य जीवन कितना दुर्लभ है। उन्होंने बताया कि मध्यलोक में कुल जीवों की संख्या के मुकाबले मनुष्यों की संख्या 29 अंक प्रमाण है, जो इसे और भी विशेष बनाता है। उन्होंने सभी लोगों से अपने भाग्य की सराहना करने और जोर से बोलने को कहा, "मैं भाग्यशाली हूँ।" उन्होंने कहा कि हमें अहिंसा के मूल धर्म के साथ ऐसे परिवार में जन्म मिला, जहां पीढ़ियों से शुद्ध आचार-विचार की परंपरा है। हमें स्वस्थ शरीर, अच्छी बुद्धि, संस्कार और धन-संपन्नता मिली है। इन सभी चीजों के लिए हमें तालियां बजानी चाहिए।

हीरे जैसी 'हीरामणी' का उदाहरण

मुनि श्री ने समझाया कि जो सौभाग्य हमें मिला है, वह हमेशा रहेगा यह जरूरी नहीं। उन्होंने एक अद्भुत उदाहरण दिया: "अगर आपके हाथ में 'हीरामणी' (हीरे जैसी दुर्लभ चीज) है और वह छिटककर समुद्र में गिर जाए, तो क्या आप उसे दोबारा पा सकते हैं?" जवाब था, "नहीं।" इसी तरह, हमें अपने जीवन के हर पल का सदुपयोग करना चाहिए, क्योंकि यह क्षण बार-बार नहीं मिलेंगे। हमारा वर्तमान पुरुषार्थ ही हमारा भावी सौभाग्य बनेगा।

शक्ति और संसाधनों का सही प्रयोग

मुनि श्री ने जोर देकर कहा कि हमें अपनी शक्ति और संसाधनों का सदुपयोग करना चाहिए। स्वस्थ शरीर को त्याग और तपस्या में लगाना इसका सही प्रयोग है। धन-संपत्ति को उदारता और अच्छे कामों में लगाना सदुपयोग है। यदि यही धन शराब और व्यर्थ के कामों में लगाया जाए तो यह दुरुपयोग है। बुद्धि का उपयोग दूसरों के हित में करना सदुपयोग है, जबकि दूसरों को लड़ाने में इसका प्रयोग दुरुपयोग है। उन्होंने रावण का उदाहरण देते हुए कहा कि जो व्यक्ति अपनी पुण्य संपदा का दुरुपयोग करता है, वह रावण की तरह इस लोक में तो निंदा का पात्र बनता ही है, परलोक में भी दुर्गति को प्राप्त होता है।

अंत में मुनि श्री ने सभी को अपने भीतर झाँकने और खुद का परीक्षण करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि आगामी सिद्धचक्र विधान जैसे शुभ क्षणों का भरपूर उपयोग करें, क्योंकि यह अवसर बार-बार नहीं मिलेंगे। अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री अवधपुरी से विहार कर बाबड़िया कला आए और यहीं पर उनके प्रवचन और आहार चर्या संपन्न हुई।


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