
ग्यारसपुर (विदिशा)।
जनपद पंचायत ग्यारसपुर की ग्राम पंचायत बंजरिया में मनरेगा योजना के तहत भारी भ्रष्टाचार की आशंका जताई जा रही है। आरोप है कि पंचायत प्रतिनिधियों और जनपद अधिकारियों की मिलीभगत से पुराने खेत तालाब को नया बताकर फिर से मंजूरी दी गई है, और मैन्युअल श्रमिकों के बजाय पोकलेन जैसी मशीनों से कार्य कर लाखों रुपए निकालने की तैयारी चल रही है।
मनरेगा की मंशा को लगा धक्का
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। परंतु बंजरिया पंचायत में इसके उद्देश्यों की अनदेखी करते हुए, श्रमिकों को दरकिनार कर मशीनों से काम कराया जा रहा है। इससे न सिर्फ योजना का उद्देश्य विफल हो रहा है, बल्कि गरीब मजदूरों के रोजगार पर भी सीधा प्रहार हो रहा है।
रिकॉर्ड में मजदूर, ज़मीन पर मशीनें
स्थानीय ग्रामीणों ने खुलकर आरोप लगाए हैं कि कई स्थानों पर सिर्फ रिकॉर्ड में मजदूरों की उपस्थिति दर्शाई जा रही है, जबकि वास्तविकता में काम मशीनों से हो रहा है। मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि गांव के शैतान सिंह लोधी के खेत में पहले से खुदी डबरी को फिर से ‘नई डबरी’ के नाम पर स्वीकृति दे दी गई है।
बिना निरीक्षण, बिना लेआउट की मंजूरी
ग्रामीणों के अनुसार, ना तो जनपद से किसी इंजीनियर द्वारा साइट का लेआउट डाला गया, और ना ही किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर निरीक्षण किया। कुछ सतही कार्य के नाम पर लाखों की राशि निकालने की तैयारी है, जो शासन के धन का सीधा दुरुपयोग माना जा रहा है।
मशीन ठेकेदार और अधिकारियों की साठगांठ?
स्थानीय सूत्रों की मानें तो कुछ अधिकारियों और मशीन संचालकों के बीच साठगांठ का आरोप भी लगाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि मनरेगा के नाम पर पोकलेन मशीन संचालकों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है और इसके एवज में मोटा कमीशन भी बंटता है।
जनपद सीईओ का जवाब
इस पूरे मामले में जब जनपद पंचायत के सीईओ जितेंद्र जैन से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने कहा, “आपके माध्यम से जानकारी मिली है, यदि पुराने तालाब को नया बताकर खुदाई की गई है तो उसकी जांच कराई जाएगी।”
पंचायत सचिव से संपर्क असफल
वहीं, ग्राम पंचायत बंजरिया के प्रभारी सचिव सुनील अहिरवार से इस विषय पर संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन उठाना जरूरी नहीं समझा।
अब सवाल यह उठता है:
क्या मनरेगा की जमीनी हकीकत सिर्फ मशीनों और कागजों तक सीमित रह जाएगी?
क्या मजदूरों के अधिकारों की यह खुली लूट यूं ही चलती रहेगी?
और क्या शासन इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई करेगा?
ज़रूरत है तत्काल जांच और कार्रवाई की
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इस मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत निष्पक्ष जांच कराएं, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए स्थानीय निगरानी तंत्र को मज़बूत किया जाए।