
(प्रयागराज विदेिशा भारती) महाकुंभ में आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था की अनूठी मिसाल देखने को मिली, जहां 1500 लोगों ने सांसारिक मोह-माया त्यागते हुए जीवित अवस्था में ही अपना पिंडदान कर नागा संन्यासी बनने की दीक्षा ली। खास बात यह रही कि इनमें 19 महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्होंने सनातन परंपरा के अनुरूप संन्यास मार्ग को अपनाने का संकल्प लिया।
जूना अखाड़े के रमता पंच के श्री महंत रामचंद्र गिरि, दूध पुरी, निरंजन भारती और मोहन गिरि की देखरेख में दीक्षा प्रक्रिया को विधिपूर्वक संपन्न किया गया। संन्यास ग्रहण करने से पहले सभी साधकों का मुंडन संस्कार किया गया, जिसके बाद उन्होंने गंगा के पवित्र जल में 108 बार डुबकी लगाकर आत्मशुद्धि की। गंगा पूजन के उपरांत, विधिपूर्वक पिंडदान कर उन्होंने सांसारिक जीवन से पूरी तरह अलग होने की घोषणा की।
"अब हम इस भौतिक संसार के नहीं रहे,"— ऐसा उदघोष करते हुए संन्यासियों ने स्वयं को मृत मानकर सांसारिक बंधनों को त्याग दिया। दीक्षा प्रक्रिया के दौरान हर-हर महादेव के गगनभेदी जयघोषों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। गुरु परंपरा के अनुसार, सभी दीक्षित नागा संन्यासियों को धर्म की सेवा और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की सीख दी गई।
महाकुंभ में आयोजित इस दीक्षा कार्यक्रम में देशभर से आए श्रद्धालु और साधु-संत उपस्थित रहे, जिन्होंने इस अनूठी आध्यात्मिक यात्रा का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया।