
नरसिंहपुर के जिला चिकित्सालय में बुधवार को लोकायुक्त पुलिस ने बड़ी कार्यवाही करते हुए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. आशीष प्रकाश सिंह और कंप्यूटर ऑपरेटर दीपिका नामदेव को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया। इन पर 5,000 रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप है, जो सैलरी निकालने के एवज में ली जा रही थी।
हर महीने सैलरी के लिए बढ़ाई जाती थी अड़चन
पीड़ित कर्मी ने बताया कि जिला अस्पताल में हर महीने सैलरी निकालने में बाधाएं खड़ी की जाती थीं। कर्मचारी से बार-बार अतिरिक्त रकम की मांग की जाती थी। इस बार 5,000 रुपये रिश्वत की मांग के बाद पीड़ित ने लोकायुक्त जबलपुर कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई।
शिकायत पर हुआ त्वरित एक्शन
शिकायत के आधार पर लोकायुक्त पुलिस ने जाल बिछाया। जैसे ही रिश्वत की रकम सीएमएचओ और कंप्यूटर ऑपरेटर को दी गई, लोकायुक्त टीम ने उन्हें मौके पर ही पकड़ लिया। टीम ने रिश्वत की रकम बरामद की और दोनों आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया।
क्या था मामला?
पीड़ित कर्मचारी ने आरोप लगाया कि सैलरी निकालने की प्रक्रिया जानबूझकर लंबित रखी जाती थी, और हर बार रिश्वत मांगकर काम करवाया जाता था। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा था, लेकिन अब लोकायुक्त की कार्रवाई से अस्पताल में भ्रष्टाचार का यह मामला सामने आया।
लोकायुक्त का बयान
लोकायुक्त जबलपुर के अधिकारियों ने कहा, “हमने शिकायत की पुष्टि के बाद कार्रवाई की। दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है, और उनके खिलाफ जांच जारी है।”
अस्पताल में मचा हड़कंप
लोकायुक्त की इस कार्रवाई के बाद जिला चिकित्सालय में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। मरीजों और कर्मचारियों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया कि किस तरह सैलरी जैसे बुनियादी हक के लिए भी रिश्वत देनी पड़ रही थी।
भ्रष्टाचार पर सवाल
यह घटना स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करती है। लोकायुक्त की इस सख्त कार्रवाई ने कर्मचारियों और अधिकारियों को चेतावनी दी है कि अब ऐसी गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।
अब सवाल उठता है: क्या इस कार्रवाई के बाद जिला अस्पताल का माहौल साफ-सुथरा होगा, या फिर भ्रष्टाचार की यह गहरी जड़ें और मजबूत होंगी?