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केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अधूरी घोषणा बनी जनता की पीड़ा: हैदरगढ़ में फिर सुलगेगी आंदोलन की चिंगारी!

2025-06-11  Amit raikwar  908 views

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12 जून से गांव की सड़कें बनेंगी सत्याग्रह का मैदान, भैयालाल श्रीवास्तव की अगुवाई में ग्रामीण देंगे आमरण अनशन की हुंकार

राघवेन्द्र दांगी विदिशा (ग्यारसपुर): वर्षों पहले मंच से गूंजे वो बोल, "हैदरगढ़ को उपतहसील बनाया जाएगा!" आज भी गांव के हर कोने में तैर रहे हैं, लेकिन हकीकत में ये घोषणा सिर्फ नारों तक सिमटकर रह गई है। शिवराज सिंह चौहान ने वादा किया था, पर किसी ने निभाया नहीं। अब ठगे गए हैदरगढ़ के ग्रामीण एक बार फिर कमर कस चुके हैं। इस बार आर-पार की लड़ाई तय है, जिसकी शुरुआत 12 जून से आमरण अनशन के साथ होगी।

उम्मीद से छलावा, जनता का टूटा भरोसा

जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अंत्योदय मेले में हैदरगढ़ को उपतहसील बनाने की घोषणा की थी, तो ग्रामीणों की आंखों में उम्मीद के दिए जल उठे थे। उन्हें लगा था कि उनकी वर्षों पुरानी मांग पूरी होगी, और राजस्व से जुड़े काम आसान हो जाएंगे। लेकिन, वह घोषणा साल दर साल सिर्फ कागज़ी औपचारिकता बनकर धूल फांकती रही।

समाजसेवी भैयालाल श्रीवास्तव का दर्द साफ झलकता है, "ना आदेश निकला, ना भवन बना, ना कर्मचारी आए और ना ही एक भी सेवा शुरू हुई। सिर्फ वादा किया गया और जनता को मूर्ख बनाया गया।" इस बयान में हैदरगढ़ की पूरी जनता की हताशा और निराशा समाहित है। यह सिर्फ एक घोषणा नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ किया गया एक बड़ा छलावा बन चुकी है।

कागजों में उपतहसील, ज़मीन पर शून्य

घोषणा के बाद से अब तक न कोई निर्माण कार्य हुआ है, न स्टाफ की नियुक्ति हुई है, और न ही कोई विभागीय अधिसूचना जारी की गई है। इस दौरान ग्रामीणों ने कई बार मुख्यमंत्री, जिला कलेक्टर, राजस्व मंत्री और अन्य अधिकारियों को पत्र भेजे। हर बार जवाब में वही पुराना राग सुनने को मिला – “विचाराधीन है।”

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने न केवल अपनी मेहनत से यह क्षेत्र बसाया है, बल्कि आज तक हर सरकारी योजना में बढ़-चढ़कर सहयोग दिया है। लेकिन जब उनकी बुनियादी ज़रूरत की बात आती है, तो उन्हें सिर्फ़ कोरे आश्वासन थमा दिए जाते हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से प्रशासन की निष्क्रियता और उदासीनता को दर्शाती है।

रोज़मर्रा की मुसीबतें: हर कदम पर बेबसी

हैदरगढ़ के लोगों को राजस्व से जुड़ी छोटी-छोटी सेवाओं के लिए भी 25 से 30 किलोमीटर दूर तहसील जाना पड़ता है। जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, भूलेख, नामांतरण जैसे ज़रूरी दस्तावेज़ों के लिए उन्हें पूरा दिन बर्बाद करना पड़ता है।

स्थानीय युवा अपनी व्यथा बताते हुए कहते हैं, "बूढ़े मां-बाप को बेटों के साथ तहसील के चक्कर लगाने पड़ते हैं। महिलाएं सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाती हैं। छात्र-छात्राओं को स्कॉलरशिप फॉर्म तक समय पर नहीं मिल पाते।" ये छोटी-छोटी रोज़मर्रा की मुश्किलें ग्रामीणों के जीवन को और भी कठिन बना रही हैं, खासकर वंचित और बुजुर्ग आबादी के लिए।

अबकी बार आर-पार की चेतावनी: सब्र टूटा

भैयालाल श्रीवास्तव ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है, "अब यह सिर्फ भूख हड़ताल नहीं रहेगी। यदि फिर अनदेखी की गई, तो गांव बंद से लेकर जिला मुख्यालय तक आंदोलन तेज किया जाएगा। अब हमारा सब्र खत्म हो गया है।" यह सिर्फ शांतिपूर्ण विरोध नहीं रहेगा। ज़रूरत पड़ने पर जेल भरो आंदोलन, रास्ता रोको, और मुख्यमंत्री के आवास पर प्रदर्शन तक की रणनीति तैयार है। हैदरगढ़ की जनता ने इस बार आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।

राजनीति की बेरुखी या प्रशासन की निष्क्रियता?

ग्रामीणों में नाराजगी सिर्फ सरकार से नहीं, बल्कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी है, जिन्होंने वर्षों से इस ज्वलंत मुद्दे पर कोई ठोस पहल नहीं की। यह हैरानी की बात है कि जिस घोषणा को लेकर खुद शिवराज सिंह चौहान ने मंच से शब्द दिए थे, वही अब केंद्र में मंत्री होने के बावजूद चुप हैं।

ग्रामीणों का सवाल है, "क्यों नहीं दिख रही अब वो संवेदनशीलता, जो माइक पर नज़र आती थी? क्या जनता सिर्फ चुनावी आंकड़ा भर रह गई है?" यह सवाल सीधे तौर पर नेताओं और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाता है।

प्रशासन की खामोशी पर उठ रहे सवाल

अब तक किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने गांव आकर लोगों से संवाद नहीं किया है। न कोई बैठक हुई है, न कोई तैयारी। इससे आंदोलनकारियों का विश्वास पूरी तरह डगमगा चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछली बार जब भूख हड़ताल में लोग बीमार पड़े थे, तब भी कोई अधिकारी पानी देने तक नहीं आया था। इस तरह की उपेक्षा अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हैदरगढ़ बोलेगा, और अब ज़ोर से बोलेगा!

भैयालाल श्रीवास्तव ने दो टूक कहा है, “अब यह हमारी अस्मिता की लड़ाई है। उपतहसील का दर्जा हमारा अधिकार है। अगर इस बार भी शासन-प्रशासन ने आंख मूंदी, तो हम अपने हक के लिए हर मोर्चे पर खड़े होंगे – चाहे वह न्यायालय हो या सड़क।”

अब गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है। हैदरगढ़ की जनता का सब्र टूट चुका है, और उनकी आवाज़ अब उग्र हो चुकी है। यदि अब भी फाइलें धूल फांकती रहीं और कुर्सीधारी चुप्पी साधे रहे, तो यह आंदोलन सरकार के लिए एक गंभीर संकट का कारण बन सकता है। 12 जून से जो अलख जलेगी, वह सिर्फ उपतहसील की मांग नहीं, बल्कि प्रशासनिक न्याय के लिए एक जनक्रांति की शुरुआत होगी।

🛑 सिर्फ वादा नहीं, अब ज़मीन पर कार्रवाई चाहिए!

क्या आपको लगता है कि इस बार सरकार हैदरगढ़ की जनता की पुकार सुनेगी? अपनी राय कमेंट बॉक्स में दें!


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