
अंकित कुशवाहा गुलाबगंज। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, गुलाबगंज में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर, ब्रह्माकुमारी रेखा दीदी ने एक ऐसा संदेश दिया जिसने सभी का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि लोग भले ही मानते हों कि श्रीकृष्ण इस कलयुग में आएंगे, लेकिन सच यह है कि श्रीकृष्ण का आगमन महाविनाश के बाद ही होगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया में पाप और भ्रष्टाचार अपने चरम पर है।
भगवान कृष्ण को लेकर क्यों है भ्रम?
ब्रह्माकुमारी रेखा दीदी ने अपने संबोधन में बताया कि भारत में फैले भ्रष्टाचार, दुख और अधर्म को देखकर लोग श्रीकृष्ण के दोबारा प्रकट होने की कामना करते हैं। वे मानते हैं कि गीता में श्रीकृष्ण ने खुद कहा है कि जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब मैं आऊँगा। लेकिन, रेखा दीदी ने स्पष्ट किया कि यह महावाक्य अशरीरी परमपिता परमात्मा ज्योतिर्लिंगम् शिव के हैं, श्रीकृष्ण के नहीं।
उन्होंने आगे कहा कि इस कलयुगी, अपवित्र और भ्रष्टाचारी सृष्टि में देवता अपना कदम भी नहीं रख सकते। श्रीकृष्ण तो वास्तव में सतयुग की शुरुआत में जन्म लेते हैं और विश्व पर शासन करते हैं। उन्हें ही बाद में 'श्री नारायण' और श्री राधा को 'श्री लक्ष्मी' कहा जाता है। सतयुग की उस पवित्र दुनिया को 'सुखधाम' या 'वैकुंठ' कहा जाता है।
परमात्मा शिव का संदेश
रेखा दीदी ने समझाया कि हर कल्प के अंत में, परमपिता परमात्मा शिव ही प्रजापिता ब्रह्मा के शरीर में आते हैं और आदि सनातन देवी-देवता धर्म की फिर से स्थापना करते हैं। वही महादेव शंकर के माध्यम से मनुष्यों को महाभारत जैसे महायुद्ध के लिए प्रेरित करते हैं ताकि अधर्म का नाश हो सके। जब पाप का पूरी तरह से अंत हो जाएगा और श्रेष्ठाचार की स्थापना होगी, तभी विष्णु के साकार रूप श्रीकृष्ण जन्म लेकर इस नई सृष्टि का पालन करेंगे।
दीदी ने बताया कि भगवान शिव इस समय अपने दोनों कर्तव्यों को ब्रह्मा और शंकर के माध्यम से पूरा कर रहे हैं। आने वाले समय में एटॉमिक युद्ध और महाविनाश के बाद ही सतयुगी सृष्टि का आरंभ होगा, और तब ही श्रीकृष्ण दोबारा आएंगे।
मन की पवित्रता है सबसे बड़ा संदेश
इस मौके पर ब्रह्माकुमारी रुक्मणी दीदी ने भी अपनी शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी सिर्फ बाहरी उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण में झाँकने का दिन है। हमें यह सोचना चाहिए कि हमारे मन को 'श्याम' ने मोह रखा है या 'काम' (विकार) ने। अगर मन में विकार हैं, तो सिर्फ भजन-कीर्तन गाने से सद्गति नहीं मिलेगी।
उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर आप सचमुच श्रीकृष्ण से प्यार करते हैं और उनके वैकुंठ में जाना चाहते हैं, तो पूरी तरह से पवित्र बनिए। आसुरी स्वभाव वाली आत्माएं वैकुंठ में नहीं जा सकतीं। श्रीकृष्ण सर्वगुण संपन्न, सोलह कला संपूर्ण और अहिंसक थे। इसलिए हमें भी अपने अंदर दैवी गुण अपनाने चाहिए।
यह पर्व हमें सिर्फ बाहरी पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं रखता, बल्कि यह आत्म-मंथन का भी मौका देता है, ताकि हम सही मायने में एक बेहतर इंसान बन सकें और सतयुगी दुनिया की तैयारी कर सकें।