
बेंगलुरु/नई दिल्ली:
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सियासी भूचाल के संकेत मिल रहे हैं। विधानसभा चुनावों में बंपर जीत के बाद सत्ता में आई कांग्रेस के लिए 'हनीमून पीरियड' अब खत्म होता दिख रहा है। राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रही अंदरूनी कलह अब खुलकर सतह पर आ गई है। यह लड़ाई कांग्रेस के दो दिग्गज क्षत्रपों - मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (DKS) के बीच है। सत्ता का यह संघर्ष इतना तेज हो गया है कि इसकी तपिश बेंगलुरु से लेकर दिल्ली दरबार तक महसूस की जा रही है।
क्या था वह 'गुप्त' समझौता, जो अब बना गले की फांस?
इस पूरे विवाद की जड़ में वह 'अघोषित' समझौता है, जो सरकार गठन के समय हुआ था। सूत्रों के मुताबिक, जब कर्नाटक में कांग्रेस जीती थी, तब सीएम पद के लिए सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों ने ही अपनी दावेदारी मजबूती से पेश की थी। उस वक्त गतिरोध को टालने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने कथित तौर पर 'ढाई-ढाई साल' का फॉर्मूला तय किया था।
इस फॉर्मूले के तहत, पहले ढाई साल सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री रहना था और बाकी के ढाई साल डीके शिवकुमार को यह जिम्मेदारी सौंपी जानी थी। लेकिन, अब जैसे-जैसे समय बीत रहा है, यह फॉर्मूला खटाई में पड़ता नजर आ रहा है। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अब कुर्सी छोड़ने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं और वे पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर, 'संकटमोचक' कहे जाने वाले डीके शिवकुमार का मानना है कि वे मुख्यमंत्री बनने के पूरे हकदार हैं और समझौते का पालन होना चाहिए।
सिद्धारमैया की 'पावर डिनर' डिप्लोमेसी और डीकेएस का दिल्ली दांव
कर्नाटक कांग्रेस में चल रही यह खींचतान तब और तीखी हो गई, जब हाल ही में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ एक अहम बैठक बुलाई। इस शक्ति प्रदर्शन वाली बैठक की सबसे बड़ी बात यह रही कि इसमें उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को न्योता ही नहीं दिया गया। इस 'एक्सक्लूसिव' बैठक ने डीके खेमे में खलबली मचा दी।
सिद्धारमैया के इस दांव के जवाब में डीके शिवकुमार भी चुप नहीं बैठे हैं। उनके समर्थक विधायक तुरंत दिल्ली पहुंच गए और वहां कांग्रेस आलाकमान से मुलाकात की। इन विधायकों ने स्पष्ट रूप से नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठाई है और आलाकमान को पुराना वादा याद दिलाया है।
आलाकमान का असमंजस: 'सिद्धू' पर भरोसा या 'डीके' का जोश?
फिलहाल, कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व एक बड़े धर्मसंकट में फंसा हुआ है। खबरें हैं कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और लोकसभा चुनावों को देखते हुए आलाकमान ने अभी के लिए सिद्धारमैया को ही मुख्यमंत्री बनाए रखने का फैसला किया है। नेतृत्व को डर है कि अभी कोई भी बदलाव पार्टी के भीतर बड़े विद्रोह को जन्म दे सकता है।
लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि डीके शिवकुमार, जिन्होंने पार्टी को सत्ता में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, वे कब तक धैर्य रखेंगे? क्या सिद्धारमैया अपनी कुर्सी बचा पाएंगे, या डीके शिवकुमार का सीएम बनने का इंतजार खत्म होगा? कर्नाटक की यह सियासी पिक्चर अभी बाकी है और आने वाले दिन बेहद दिलचस्प होने वाले हैं।