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विदिशा: SATI इंजीनियरिंग कॉलेज में 'एरियर' का बड़ा खेल? अपात्रों पर मेहरबानी और पात्रों की अनदेखी के गंभीर आरोप

2026-03-23  BHOPAL REPORTER VIJAY SHARMA  389 views

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विदिशा। मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित सम्राट अशोक टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (SATI) इंजीनियरिंग कॉलेज में वित्तीय अनियमितताओं और बंदरबांट को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ग्रांट और एरियर भुगतान में कथित धांधली के आरोपों ने कॉलेज प्रशासन से लेकर शासन की निगरानी व्यवस्था तक को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को लाभ पहुंचाया गया, जबकि हकदार कर्मचारी आज भी अपने एरियर की राह देख रहे हैं।


क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता चेतन सिंह राजपूत ने कॉलेज की भुगतान प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए भ्रष्टाचार के सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। राजपूत के अनुसार, कॉलेज प्रबंधन ने एरियर गणना में भारी विसंगतियां की हैं। सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि कुछ कर्मचारियों का एरियर डेटा ही तैयार नहीं किया गया, जिससे उनकी पात्रता पर संकट खड़ा हो गया है।


नियमों की धज्जियां उड़ाने का आरोप
इस पूरे मामले में वित्तीय पारदर्शिता को लेकर तीन मुख्य बिंदु सामने आए हैं, जो भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं:


 89 दिनों की सेवा का 'जादू': आरोप है कि मात्र 89 दिनों की अल्पकालिक सेवा (Short-term service) को 'नियमित सेवा' मानकर भुगतान की गणना कर ली गई। यह नियमों का खुला उल्लंघन है।


कट-ऑफ डेट की अनदेखी: 1 अप्रैल 2000 के बाद नियमित हुए कर्मचारियों को भी एरियर का लाभ देने की कोशिश की गई है, जो पात्रता नियमों के विपरीत बताया जा रहा है।


पदों की स्थिति पर पर्दा: स्वीकृत पदों की वास्तविक संख्या और पात्रता संबंधी दस्तावेजों को नजरअंदाज कर कुछ विशेष लोगों को आर्थिक फायदा पहुंचाने का प्रयास हुआ है।
उच्चस्तरीय जांच की उठी मांग
चेतन सिंह राजपूत ने इस पूरे वित्तीय खेल के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए शासन से उच्चस्तरीय जांच (High-level Inquiry) की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि:


 संदिग्ध और विवादित भुगतानों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।
 एरियर गणना के रिकॉर्ड की फोरेंसिक जांच हो।
 नियम विरुद्ध लाभ देने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए।


पारदर्शिता पर लगा प्रश्नचिह्न
SATI जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में इस तरह के आरोपों ने सरकारी ग्रांट के सदुपयोग पर सवालिया निशान लगा दिया है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह विवाद कोर्ट की चौखट तक पहुंच सकता है। विदिशा के गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि क्या शासन इन 'सफेदपोश' गड़बड़ियों पर नकेल कसेगा या मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा?


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