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विदिशा: बेशकीमती सागौन के जंगल पर 'हरा सोना' माफिया की टेढ़ी नजर! क्या वन विभाग जानबूझकर आंखें मूंदे है?

2025-09-14  Baby jain  1,179 views

ImgResizer_20250914_2018_16300शुभम् जैन विदिशा- हरे-भरे जंगल, जो कभी हमारे गौरव थे, अब वन माफियाओं की काली करतूतों का शिकार हो रहे हैं। विदिशा जिले के ग्यारसपुर वन परिक्षेत्र के हैदरगढ़ सर्किल के अंतर्गत आने वाले धोखेड़ा बीट में बेशकीमती सागौन के पेड़ों की अवैध कटाई धड़ल्ले से चल रही है, लेकिन वन विभाग कुंभकर्ण की नींद सो रहा है। यह सिर्फ पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण के खिलाफ एक गंभीर साजिश है, जिसमें जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

सागौन: 'हरा सोना' बन गया माफियाओं का शिकार

सागौन की लकड़ी को 'हरा सोना' कहा जाता है। अपनी मजबूती और सुंदरता के कारण यह बाजार में लाखों रुपये प्रति घन मीटर में बिकती है। यही वजह है कि वन माफिया इस 'सोने' की खोज में इन जंगलों में घुस चुके हैं। धोखेड़ा बीट में बड़े-बड़े सागौन के पेड़ बेरहमी से काट दिए गए हैं। यह सब खुलेआम हो रहा है, जिससे स्थानीय लोग हैरान हैं। उनकी मानें तो, यह सब वन विभाग की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।

मिलीभगत का खेल: सरकार की नीतियां सिर्फ कागजों पर?

यह मामला सिर्फ पेड़ों की कटाई का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और सांठगांठ का भी है। ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी आरोप लगाते हैं कि वन माफिया और वन विभाग के कर्मचारियों के बीच गहरी सांठगांठ है। अगर ऐसा न होता, तो इतनी बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटना और लकड़ियों की तस्करी करना नामुमकिन था। एक तरफ सरकार बड़े-बड़े पौधारोपण अभियान चलाती है और पर्यावरण बचाने के वादे करती है, वहीं दूसरी तरफ पहले से लगे हुए कीमती पेड़ों को माफिया के हवाले कर दिया जाता है। यह कथनी और करनी का इतना बड़ा अंतर है जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है।

वन्यजीवों पर खतरा और पर्यावरण का असंतुलन

इन जंगलों का तेजी से कटना न सिर्फ वन्यजीवों के लिए खतरा है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण असंतुलन का भी एक बड़ा कारण है। अगर इस पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में सागौन जैसे बेशकीमती पेड़ सिर्फ किताबों और तस्वीरों में ही नजर आएंगे। यह एक ऐसी विडंबना है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में अपनी प्राकृतिक विरासत की परवाह करते हैं?

जांच का वादा, डीएफओ की चुप्पी

इस गंभीर मुद्दे पर जब हमने अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, तो स्थिति और भी चिंताजनक दिखी। डीएफओ हेमंत यादव ने हमारे फोन का जवाब देना उचित नहीं समझा, जिससे उनकी उदासीनता साफ झलकती है। हालांकि, रेंजर मुस्कान शिवहरे ने संज्ञान लेते हुए कहा, “मुझे आपके माध्यम से जानकारी मिली है। मैं कल टीम भेजकर जांच कराऊंगी और अगर अवैध कटाई की गई है, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

रेंजर का यह आश्वासन उम्मीद तो जगाता है, लेकिन सवाल यह है कि जब यह सब हो रहा था, तब वे कहां थीं? क्या उन्हें अपनी बीट में चल रही इन गतिविधियों की कोई खबर नहीं थी? अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह सिर्फ एक वादा है या वास्तव में कोई ठोस कार्रवाई की जाएगी। ग्यारसपुर का यह मामला एक चेतावनी है कि अगर हम अपनी प्राकृतिक संपदा को बचाना चाहते हैं, तो हमें माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ को खत्म करना होगा।


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