
सीधी, मध्य प्रदेश: करोड़ों रुपए की सिंचाई परियोजनाएं मध्य प्रदेश में किसानों के लिए जीवनदायिनी बनने के बजाय अब 'आपदा' का पर्याय बन रही हैं। ऐसा ही हाल सीधी जिले के रामपुर नैकिन जनपद अंतर्गत ग्राम खरहना में देखने को मिल रहा है, जहाँ शिकारगंज वितरण क्रमांक 2 की माइनर नहर पिछले पाँच वर्षों में 9 बार से ज्यादा टूट चुकी है। यह जर्जर नहर किसानों के लिए सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और भविष्य को तबाह करने वाला 'कहर' बन गई है।
नहर नहीं, 'प्रशासनिक लापरवाही' का स्मारक! लाखों की फसलें तबाह
इस नहर के बार-बार टूटने की घटना ने सीधी के सैकड़ों किसानों को गहरे संकट में डाल दिया है। हर बार नहर फूटती है, और हर बार लाखों की फसलें खेत में ही जलमग्न होकर सड़ जाती हैं।
ताज़ा मामले में किसान सुधीर त्रिपाठी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उनकी 50 किलो आलू और 2 किलो लहसुन की फसल नहर के पानी में डूबकर पूरी तरह नष्ट हो गई।
किसान मुकेश त्रिपाठी ने अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा, “यह नहर अब जर्जर नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता स्मारक बन चुकी है। हर बार फूटती है और हर बार हमें कंगाल कर जाती है। हम उच्च-स्तरीय मरम्मत चाहते हैं, नहीं तो इसे हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए।”
एक अन्य किसान ने पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि, "हमारी सालभर की कमाई और मेहनत मिट्टी में मिल गई है। क्या सरकार तब जागेगी, जब कोई किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाएगा?" इन बयानों से स्पष्ट है कि यह मामला अब सिर्फ सिंचाई का नहीं, बल्कि किसानों के जीवन-मरण का सवाल बन चुका है।
केवट बस्ती पर 'डूब' का खतरा! गरीब ग्रामीणों के कच्चे घरों में दरारें
नहर की यह 'आपदा' अब खेतों से निकलकर सीधे गाँव की आबादी तक पहुँच चुकी है। नहर से लगातार हो रहे रिसाव (सीपेज) के कारण केवट बस्ती के लगभग सभी घर कमजोर हो चुके हैं।
स्थानीय ग्रामीण दिनेश कुमार त्रिपाठी बताते हैं कि सीपेज के कारण घरों की नींव कमजोर हो रही है, और कई घरों में तो बड़ी-बड़ी दरारें आ चुकी हैं।
सबसे हृदय विदारक कहानी गरीब ग्रामीण कुसमा केवट की है। उन्होंने दर्द भरे शब्दों में बताया, “हर साल नहर फूटती है और हमारा कच्चा घर टूट-फूट जाता है। हम इतने गरीब हैं कि हर साल घर नहीं बना सकते। क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है? क्या हमारे घरों के ढह जाने पर ही उनकी आँखें खुलेंगी?”
यह स्थिति साफ तौर पर दिखाती है कि प्रशासन और सिंचाई विभाग की उदासीनता ने न सिर्फ किसानों को, बल्कि केवट बस्ती के गरीब परिवारों को भी 'डूब' के गंभीर खतरे में डाल दिया है।
5 साल, 9 ब्रेक: कार्रवाई सिर्फ कागजों पर?
ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि 5 वर्षों में 9 बार नहर टूटने के बावजूद सिंचाई विभाग और स्थानीय प्रशासन ने कोई स्थायी मरम्मत नहीं की। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आज तक न तो फसलों की क्षति का आकलन (Assessment) हुआ, और न ही प्रभावित किसानों को कोई मुआवजा दिया गया है।
यह स्थिति न केवल स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी पर सवाल उठाती है, बल्कि प्रदेश की सिंचाई परियोजनाओं के रखरखाव (Maintenance) की पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
ग्रामीणों ने अब मांग की है कि इस 'तकनीकी लापरवाही' की उच्च-स्तरीय जाँच की जाए। साथ ही, नहर का स्थाई सुधार, सीपेज रोकने के लिए बेहतर इंजीनियरिंग समाधान, और प्रभावित किसानों एवं केवट बस्ती के गरीब परिवारों को तुरंत मुआवजा दिया जाए, ताकि किसी बड़ी मानवीय त्रासदी से बचा जा सके।