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जैन संतों की सुरक्षा पर NHRC का बड़ा हंटर: 7 राज्यों के मुख्य सचिव तलब, 4 हफ्ते में मांगी रिपोर्ट

2025-12-20  Reporter vidisha Raghvendra Dangi  563 views

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विदिशा। भारत की पावन धरा पर अहिंसा और शांति का संदेश देने वाले जैन संतों पर हो रहे हमले और सड़क हादसों ने अब राष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मचा दिया है। पिछले कुछ समय से जिस तरह जैन मुनियों और साध्वियों को निशाना बनाया जा रहा है, उसने पूरे देश के जैन समाज को आक्रोशित कर दिया है। इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने सात राज्यों की सरकारों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

प्रियंक कानूनगो की पीठ ने दिखाई सख्ती

अखिल भारतीय जैन परिषद के जिला संयोजक विनोद के. शाह की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनएचआरसी के माननीय सदस्य प्रियंक कानूनगो की पीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और बिहार के मुख्य सचिवों तथा पुलिस महानिदेशकों (DGP) को नोटिस जारी किया है। 'मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993' की धारा 12 के तहत इन राज्यों को अब चार सप्ताह के भीतर यह बताना होगा कि अहिंसा के दूतों की सुरक्षा में चूक क्यों हो रही है?

हादसे या साजिश? याचिका में उठाए गए चुभते सवाल

याचिकाकर्ता विनोद के. शाह ने आयोग के सामने चौंकाने वाले तथ्य रखे हैं। उन्होंने कहा कि जैन साधु-साध्वी अपने धर्म का पालन करते हुए पैदल 'पदविहार' करते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में सड़क दुर्घटनाओं के नाम पर उनकी जान जाने की घटनाओं में संदिग्ध रूप से इजाफा हुआ है।

 * असामाजिक तत्वों की भूमिका: याचिका में आरोप लगाया गया है कि राजस्थान और गुजरात में हुई कुछ 'दुघर्टनाएं' महज इत्तेफाक नहीं थीं, बल्कि इनके पीछे कुछ असामाजिक संगठनों की संदिग्ध भूमिका सामने आई है।

 * नीमच और बिहार की घटनाएं: मध्य प्रदेश के नीमच और बिहार के नेशनल हाईवे पर जैन साधुओं के साथ मारपीट, अभद्रता और बदसलूकी की घटनाओं ने शासन-प्रशासन की लचर सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है।

क्या हैं जैन समाज की प्रमुख मांगें?

विनोद शाह ने अपनी याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया है, जिसमें पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित फुटपाथ को 'मूलभूत अधिकार' माना गया है। जैन समाज ने सरकारों से मांग की है कि:

 * सुरक्षा घेरा: संतों के पदविहार के दौरान स्थानीय पुलिस स्टेशन से कम से कम दो पुलिसकर्मियों का बल (गार्ड) अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराया जाए।

 * सुरक्षित विश्राम स्थल: जिन क्षेत्रों में जैन मंदिर या जैन बस्तियां नहीं हैं, वहां संतों के रात्रि विश्राम के लिए सुरक्षित सरकारी भवनों या विशेष शेल्टर की व्यवस्था की जाए।

 * हाईवे सेफ्टी: राष्ट्रीय राजमार्गों पर भारी वाहनों की आवाजाही के बीच पैदल विहार करने वाले संतों के लिए विशेष कॉरिडोर या सुरक्षा संकेतों का प्रबंध हो।

अग्निपरीक्षा में राज्य सरकारें

जैन मुनियों की सुरक्षा केवल एक धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था का विषय है। एनएचआरसी की इस कार्रवाई के बाद अब गेंद राज्यों के पाले में है। क्या सरकारें चार हफ्तों में कोई ठोस सुरक्षा प्लान पेश कर पाएंगी या फिर 'अहिंसा परमो धर्म' का मार्ग अपनाने वाले ये संत यूं ही असुरक्षित सड़कों पर चलते रहेंगे? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।


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