विदिशा: मध्य प्रदेश के सरकारी महकमों में आउटसोर्सिंग के नाम पर चल रही व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। सरकारी विभागों, निगमों और मंडलों में मानव संसाधन (Manpower) की आपूर्ति करने वाली निजी एजेंसियों की मनमानी और नियमों की अनदेखी को लेकर अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है।
पंचायत ने सीधे तौर पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग विभाग (MSME) के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर इस पूरी व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को उजागर किया है।
भंडारक्रय नियमों की धज्जियाँ और भ्रम का जाल
ग्राहक पंचायत का आरोप है कि प्रदेश में भंडारक्रय नियम 2015 प्रभावी होने के बावजूद, आउटसोर्सिंग सेवाओं में इसका पालन सिर्फ कागजों तक सीमित है। वर्तमान में स्थिति यह है कि:
* सेवा शुल्क (Service Charge): अलग-अलग विभागों में एजेंसियों का सर्विस चार्ज अलग है, जिसमें कोई एकरूपता नहीं है।
* नियमों का टकराव: केंद्र सरकार की GeM (Government e-Marketplace) व्यवस्था और मध्य प्रदेश वित्त विभाग के आदेशों में विरोधाभास होने के कारण भारी भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
* श्रेणीकरण का अभाव: लंबे समय से निजी एजेंसियों का पैनल वर्गीकरण (Empanelment) नहीं किया गया है, जिससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा खत्म हो रही है।
पारदर्शिता पर लगा ‘ग्रहण’
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य विनोद के. शाह ने स्पष्ट किया है कि पारदर्शिता के अभाव में आउटसोर्सिंग व्यवस्था भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की भेंट चढ़ रही है। जब एजेंसियों का पैनल ही स्पष्ट नहीं है, तो निविदा (Tender) प्रक्रिया महज एक औपचारिकता बनकर रह गई है। यह सीधे तौर पर भंडारक्रय नियमों की मूल भावना का उल्लंघन है।
ग्राहक पंचायत की प्रमुख मांगें
पंचायत ने शासन से मांग की है कि प्रदेश में आउटसोर्सिंग के लिए एक 'एकरूप और पारदर्शी नीति' तत्काल लागू की जाए। पत्र में जोर दिया गया है कि:
* सभी विभागों के लिए सर्विस चार्ज की एक निश्चित सीमा तय हो।
* एजेंसियों का नए सिरे से वर्गीकरण और पैनल तैयार किया जाए।
* GeM और राज्य के नियमों के बीच के विरोधाभास को दूर किया जाए ताकि निजी एजेंसियां मनमानी न कर सकें।
क्या होगा असर?
अगर सरकार इन विसंगतियों को दूर नहीं करती है, तो इसका सीधा असर उन हजारों युवाओं पर पड़ता है जो आउटसोर्सिंग के माध्यम से काम कर रहे हैं। अक्सर देखा गया है कि स्पष्ट नीति न होने का फायदा उठाकर एजेंसियां कर्मचारियों के वेतन और सुविधाओं में कटौती करती हैं।
अब देखना यह है कि विदिशा से उठी यह आवाज भोपाल के गलियारों में कितनी जल्दी सुनी जाती है और क्या वाकई मध्य प्रदेश शासन आउटसोर्सिंग के इस 'मकड़जाल' को साफ करने के लिए कोई ठोस कदम उठाता है।