VIDISHA BHARTI

collapse
...
Home / Politics/राजनीति / "एक पेड़ मां के नाम", बाकी पेड़ 'ठेकेदार के नाम' — ग्यारसपुर में हरे-भरे पेड़ों की बलि!

"एक पेड़ मां के नाम", बाकी पेड़ 'ठेकेदार के नाम' — ग्यारसपुर में हरे-भरे पेड़ों की बलि!

2025-05-04  Editor Shubham Jain  549 views

ImgResizer_20250504_1943_32921
ग्यारसपुर से देवेंद्र धाकड़ की रिपोर्ट —

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान पूरे देश में धूम मचा रहा है। सोशल मीडिया पर नेता से लेकर अभिनेता तक, सब अपनी तस्वीरें पेड़ लगाते हुए पोस्ट कर रहे हैं। इधर शिवराज सिंह चौहान तो हर रविवार को पेड़ लगाने की ऐसी शपथ लेते हैं जैसे पेड़ न हुए, पर्यावरण का ‘हनुमान चालीसा’ हो गया। लेकिन... ग्यारसपुर के ठेकेदार जी ने शायद ये अभियान पीछे से पढ़ लिया — “एक पेड़ मां के नाम, बाकी सब पेड़ काट दो काम के नाम!”

यूको बैंक के सामने, पेड़ों की बर्बादी सामने

बिजली विभाग के ठेकेदार ने बिना किसी वैध अनुमति के हरे-भरे पेड़ों पर आरी चला दी। पेड़ क्या थे, वर्षों पुरानी छांव देने वाली जीवनरेखा थे। पर ठेकेदार के लिए शायद वो बस ‘रास्ते की रुकावट’ थे, जिन्हें बिना किसी नोटिस के ‘कट टू क्लाइमेक्स’ कर दिया गया।

'हरित अभियान' या 'हरित विनाश'?

देश की राजधानी से लेकर ग्यारसपुर तक, ‘हरित क्रांति 2.0’ की हवा बह रही है। लेकिन ठेकेदार बाबू को न हवा दिखी, न कानून की परवाह। प्रशासन ने पेड़ काटने की इजाज़त नहीं दी, लेकिन आरी ने तो जैसे अनुमति पत्र खुद काट लिया हो!

अब सवाल ये उठता है कि जब देश के प्रधानमंत्री पेड़ लगाकर मां के प्रति श्रद्धा जता रहे हैं, तो ये ठेकेदार किसके नाम पेड़ काट रहा है? कहीं ये "ठेकेदार की चाची के नाम" तो नहीं?

बिजली विभाग बोले – “हमने नहीं, पीएचई वालों ने काटा”

जब बात बिगड़ने लगी और जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया, तो बिजली विभाग के सुपरवाइज़र साहब ने तुरंत ही बयान दे मारा — “हमने नहीं कटवाए, पीएचई विभाग ने काटे हैं। हम तो बस पेड़ों की टहनियाँ छँटवा रहे थे।”

वाह जनाब! जैसे चोरी करते पकड़े जाने पर बच्चा कहता है — "मैं तो बस देख रहा था!" एक विभाग दूसरे पर ठीकरा फोड़ता रहा, और बेचारे पेड़ कटकर जमीन पर बिछते रहे।

ठेकेदारों की नई परिभाषा: ‘ठेके से काटो, बिना रोक-टोक काटो’

कभी सुना था कि ठेके पर काम होता है, अब पता चला कि ‘ठेके पर पेड़ कटते’ भी हैं। बिना पर्यावरण विभाग की अनुमति, बिना ग्राम पंचायत की सहमति, और बिना जन भावना की परवाह, ठेकेदार ने पेड़ कटवा दिए। सवाल ये है कि क्या विकास का मतलब पेड़ों की बलि है?

स्थानीय जनता बोली – “ये हरियाली नहीं, ठेकेदारी की बेरुख़ी है”

स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस अवैध कटाई की तीव्र निंदा की है। “हमने तो सोचा था कि पेड़ लगेंगे, बच्चों को ऑक्सीजन मिलेगी, लेकिन यहाँ तो बच्चों को अब पेड़ की तस्वीरें दिखाकर ही समझाना पड़ेगा कि 'बेटा, ये चीज़ कभी सच्ची हुआ करती थी।'”

एक बुजुर्ग महिला ने कहा – “हमने इन पेड़ों को बच्चों की तरह बड़ा किया है, अब अगर कोई हमारे बच्चों को ऐसे काट दे, तो क्या हम चुप बैठें?”

वन विभाग की चुप्पी – पेड़ गिरते गए, अफसर सोते रहे

वन विभाग की नींद तब टूटी जब पेड़ पहले ही धराशायी हो चुके थे। अब बयानबाज़ी और जाँच की लोरी सुनाई जा रही है। अधिकारी कहते हैं — “जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।” जाँच भी वो जो सालों तक चले, और जब तक रिपोर्ट आए, ठेकेदार अगला जंगल तलाश ले।

 ठेके की कैंची से नहीं, समझदारी से कटे समस्या

एक ओर पेड़ लगाने का संकल्प, दूसरी ओर पेड़ काटने का ठेका — ये विरोधाभास हमारे सिस्टम की सच्चाई है। यदि हमें सच में 'हरित भारत' बनाना है, तो सिर्फ पौधारोपण नहीं, पौधारक्षण भी ज़रूरी है।

ठेकेदार को सिर्फ मुनाफ़ा दिखता है, लेकिन प्रशासन को संवेदनशील होना होगा। हर पेड़ केवल लकड़ी नहीं, वो छाया, जीवन, ऑक्सीजन और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीद है। तो अगली बार जब कोई कहे – "पेड़ काटो, रास्ता साफ़ करो", तो ज़रा सोचिए — कहीं आप विकास की राह में प्रकृति की लाशें तो नहीं बिछा रहे?


Share:

26