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ब्रेकिंग एक्सक्लूसिव: छतरपुर में 'अरबों' की सरकारी संपत्ति पर 'दस्तावेज़ी डाका'! कौन है इस महाघोटाले का 'मास्टरमाइंड'?

2025-10-06  Editor Shubham Jain  799 views

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छतरपुर (मध्य प्रदेश)। छतरपुर में सरकारी संपत्ति की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है। दस्तावेजों में हेराफेरी कर लोक निर्माण विभाग (PWD) की बहुमूल्य जमीन और 196 बंगलों को खुर्द-बुर्द करने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। यह सिर्फ अतिक्रमण का मामला नहीं है, बल्कि एक संगठित 'लाभार्थी गिरोह' द्वारा सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने का गंभीर खेल है, जिसमें विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत का संदेह गहरा रहा है। सवाल उठता है कि आखिर अरबों रुपये की इस सरकारी दौलत पर डाका डालने का खेल किसके इशारे पर खेला गया और क्या अब इस जमीन को कब्ज़े से मुक्त कराया जा सकेगा?ImgResizer_20251006_2123_09707
दबी हुई चिट्ठी और 'लाभार्थी गिरोह' का खेल
इस पूरे घोटाले की जड़ें साल 2018 की एक महत्वपूर्ण सरकारी कार्रवाई में छिपी हैं, जिसे जानबूझकर दबा दिया गया।
दरअसल, सीएम हेल्पलाइन की शिकायत क्रमांक 5579538 के जवाब में, मुख्य अभियंता, लोक निर्माण विभाग, सागर परिक्षेत्र ने दिनांक 17 अप्रैल 2018 को एक स्पष्ट निर्देश जारी किया था। उन्होंने पत्र क्रमांक 213 के माध्यम से कार्यपालन यंत्री, छतरपुर को यह निर्देश दिया था कि:
"यदि लोक निर्माण विभाग की यह संपत्ति नगर पालिका क्षेत्र में आती है, तो उसे तत्काल नगर पालिका के अधिपत्य में दिए जाने हेतु कलेक्टर, जिला छतरपुर से संपर्क कर आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए, ताकि हो रहे अतिक्रमण को रोका जा सके।"
यह निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण था। यदि इसका पालन किया गया होता, तो आज PWD के ये 196 बंगले और उनकी बेशकीमती ज़मीन नगर पालिका छतरपुर के अधीन होती। लेकिन, सूत्रों के अनुसार, इस पत्र को जानबूझकर 'गायब' कर दिया गया।


अरबों का घाटा: किसे मिला फायदा?
पत्र को दबाने के पीछे सीधा कारण था – विभाग के भीतर सक्रिय 'लाभार्थी गिरोह'। यह गिरोह नहीं चाहता था कि संपत्ति नगर पालिका को सौंपी जाए, क्योंकि ऐसा होने पर उनके द्वारा किया जा रहा अवैध कब्ज़ा और दस्तावेज़ी हेराफेरी बंद हो जाती।
नगर पालिका को यह संपत्ति मिलने से छतरपुर शहर की दो बड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान हो सकता था:
* पार्किंग समस्या का समाधान: इन विशाल भूखंडों का उपयोग व्यवस्थित सार्वजनिक पार्किंग स्थल बनाने के लिए किया जा सकता था, जिससे शहर की यातायात व्यवस्था सुधरती।
* नगर पालिका की आय में बढ़ोतरी: इस संपत्ति का प्रबंधन और व्यावसायिक उपयोग नगर पालिका के लिए स्थायी आय का स्रोत बन सकता था, जिससे विकास कार्यों को गति मिलती।
लेकिन, विभाग के 'भीतरघात' के चलते यह मौका हाथ से निकल गया और सरकारी संपत्ति एक-एक कर निजी कब्ज़ों में चली गई।
सबसे बड़ा सवाल: किस अधिकारी ने खेला यह 'खेल'?
यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से जारी, मुख्य अभियंता द्वारा निर्देशित एक सरकारी पत्र को केवल एक बाबू या निचले स्तर का कर्मचारी नहीं दबा सकता। यह कार्य उच्च अधिकारियों की मिलीभगत या मौन सहमति के बिना संभव नहीं था।
सवाल यह है: आखिर किस अधिकारी या अधिकारियों के समूह के इशारे पर अरबों की इस सरकारी संपत्ति को हेराफेरी कर बेचा गया?
सरकारी संपत्ति के दस्तावेजों में फेरबदल करना और उसे अवैध कब्ज़े के लिए रास्ता देना एक गंभीर आपराधिक कृत्य है। यह सीधे तौर पर सरकारी राजस्व और आम जनता के हितों को नुकसान पहुँचाना है। इस पूरे मामले में 'फाइलें दबाने' और 'दस्तावेज बदलने' वाले अधिकारी रडार पर हैं।
जांच की आंच और मुक्ति की चुनौती
अब समय आ गया है जब इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच हो। यह जांच केवल बंगलों के अवैध विक्रय तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन सभी अधिकारियों की भूमिका की जाँच होनी चाहिए जिन्होंने 2018 के मुख्य अभियंता के पत्र को दबाया और सरकारी संपत्ति को लूटने का रास्ता साफ़ किया।
कलेक्टर और नगर पालिका को इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि संपत्ति कब बेची गई, सवाल यह है कि क्या प्रदेश सरकार की अरबों की इस संपत्ति को संगठित गिरोह के चंगुल से मुक्त कराया जा सकेगा? छतरपुर की जनता इस गंभीर मामले में प्रशासन से त्वरित और निर्णायक कार्रवाई की उम्मीद कर रही है। यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और सरकारी व्यवस्था की अखंडता का मामला है।
 


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