
भोपाल (अवधपुरी): "जो भीतर से जीता है, वही खुद को बदल पाता है।" इसी विचार को केंद्र में रखकर, मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज और मुनि श्री संधान सागर महाराज के सानिध्य में एक दस दिवसीय श्रावक संस्कार शिविर का शुभारंभ हो रहा है। आचार्य विद्यासागर प्रबंधकीय संस्थान विद्या प्रमाण गुरुकुलम में आयोजित इस शिविर का मार्गदर्शन बाल ब्र. अशोक भैया लिधौरा करेंगे।
मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन के अनुसार, यह शिविर केवल भोपाल ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के गुरु भक्तों को आकर्षित कर रहा है। सभी गुरु सानिध्य में रहकर तपस्या और धर्म की आराधना करेंगे। शिविर का अनुशासन कठोर होगा, जिसमें सभी प्रतिभागियों को सुबह 4:30 बजे उठना होगा।
शिविर की दिनचर्या
* सुबह 4:30 बजे: जागरण और नित्यक्रिया।
* सुबह 5:45 बजे: भावना योग।
* सुबह 8:30 से 9:30 बजे: मुनिश्री के प्रवचन।
* दोपहर 2:30 बजे: तत्वार्थसूत्र का वाचन।
* शाम 6:20 बजे: शंका समाधान और आरती।
स्थानीय लोग जो शिविर में भाग नहीं ले रहे हैं, वे सुबह 10 बजे तक के कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं।
प्रवचन श्रंखला का समापन
मुनिश्री की पिछले आठ दिनों से चल रही प्रवचन श्रंखला का रविवार को समापन हुआ। इन प्रवचनों में उन्होंने भावनाओं पर नियंत्रण, जीवन मूल्यों, पारिवारिक प्रेम, और समाज व राष्ट्र के प्रति बोध जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चिंतन दिया।
समापन के अवसर पर, मुनि श्री ने "जीओ भीतर से, बदलो दुनिया को" विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर व्यवस्था और समाज को बदलने की बात करते हैं, लेकिन यह हमारे हाथ में नहीं है। असली बदलाव हमारी खुद की अवस्था में होना चाहिए। जब हम खुद को बदलते हैं, तो हमारा परिवार, गांव, समाज और अंततः पूरा संसार बदल जाता है।
मुनिश्री ने वृत्ति, प्रवृत्ति, और परिणाम की तीन स्थितियों पर प्रकाश डालते हुए समझाया कि जब हम बाहरी तौर पर कुछ बदल देते हैं (जैसे सिगरेट की जगह गुटका), तो यह स्थायी बदलाव नहीं होता। सच्चा बदलाव हमारी मनोवृत्ति और सोच में आना चाहिए। जब हमारी सोच बदलती है, तभी हम अपनी कमियों और कमजोरियों को पहचान पाते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि लोग अपनी बाहरी छवि पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन अपनी चेतना पर ध्यान नहीं देते। उन्होंने कहा कि जैसी हमारी भावधारा होती है, वैसे ही हमारे विचार बनते हैं। धूर्त लोगों को दुनिया धूर्त लगती है, जबकि धर्म और उदारता से भरे लोगों को सभी धार्मिक नज़र आते हैं।
अपने प्रवचन के अंत में, मुनिश्री ने क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, लोभ और वासना जैसी बुराइयों को अंदर से निकालने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “दृष्टि बदली तो सृष्टि बदल जाएगी।”