
मंदसौर, मध्य प्रदेश: कहते हैं, जब कोई अपना बिछड़ जाता है, तो परिवार उसकी वापसी की उम्मीद में वर्षों बिता देता है। लेकिन जब वही खोया हुआ अपना घर लौटता है, तो वह खुशी जीवन की सबसे बड़ी खुशी होती है। ऐसी ही एक दिल को छू लेने वाली कहानी सामने आई है मध्य प्रदेश के मंदसौर से, जहाँ करीब पाँच महीने से अपने परिवार से दूर रही बंगाल की रहने वाली सुजाता को अनामिका जनकल्याण फाउंडेशन मंदसौर की मदद से अपनी बेटी और दामाद से मिलवाया गया। अपनी बेटी और दामाद को सामने देखकर सुजाता अपनी खुशी के आँसू रोक नहीं पाईं।
दिल दहला देने वाला सफ़र और मानवीय मदद की अनूठी मिसाल
यह मार्मिक पुनर्वास कहानी है सुजाता की, जो पिछले लगभग एक महीने से मंदसौर स्थित अनामिका जनकल्याण सेवा समिति के आश्रयगृह 'कौशल्या धाम' में रह रही थीं। कुछ हद तक विक्षिप्त सुजाता की घर से दूर होने की कहानी बेहद पीड़ादायक है। कोलकाता के एक रेलवे स्टेशन पर एक गुजराती परिवार ने उन्हें खाने में नशीला पदार्थ खिलाकर अपने घर ले गया और उनसे ज़बरदस्ती काम करवाया। इस काम के बदले सुजाता को सिर्फ़ खाना मिलता था, और जल्द ही उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी।
प्रताड़ना से तंग आकर, सुजाता माता मंदिर में पूजा का बहाना बनाकर वहाँ से किसी तरह भाग निकलीं और भटकते हुए मंदसौर के सीतामऊ क्षेत्र में पहुँचीं। वहाँ की स्थानीय पुलिस को सूचना मिली, जिसके बाद 2 जून को सीतामऊ पुलिस ने उन्हें समाजसेविका अनामिका जैन को सौंप दिया।
गूगल ट्रांसलेट और अथक प्रयासों से मिला परिवार
अनामिका जैन और उनकी टीम ने सुजाता की बंगाली भाषा को समझने के लिए गूगल ट्रांसलेट का सहारा लिया। उन्होंने लगातार सुजाता की काउंसलिंग की और धैर्यपूर्वक उनसे उनके घर का पता जानने की कोशिश की। सुजाता को अपने मोबाइल नंबर याद आने पर, टीम ने उनके दामाद और बेटी से संपर्क किया। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि हाँ, सुजाता लगभग पाँच महीने पहले घर से निकली थीं और वापस नहीं लौटीं। सुजाता के दामाद ने यह भी बताया कि सुजाता के पति दिल के मरीज़ हैं और उनकी बाईपास सर्जरी भी हो चुकी है। उनकी दो बेटियाँ हैं, जिनमें से एक की शादी हो चुकी है।
खुशी का पुनर्मिलन और मानवीय सेवा का अद्भुत कार्य
सुजाता के दामाद और उनकी छोटी बेटी उन्हें लेने मंदसौर पहुँचे। अनामिका जनकल्याण सेवा समिति ने सभी आवश्यक कागज़ी कार्रवाई और परिवार की पहचान सुनिश्चित करने के बाद सुजाता को उनके परिजनों को सौंप दिया। जब सुजाता अपनी छोटी बेटी और दामाद से मिलीं, तो खुशी के मारे उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। यह पल वहाँ मौजूद सभी लोगों के लिए बेहद भावुक कर देने वाला था।
समाजसेविका अनामिका प्रदीप जैन मंदसौर में कई वर्षों से जन सहयोग से विक्षिप्त महिला आश्रयगृह का संचालन कर रही हैं। अनामिका अब तक 42 लावारिस और विक्षिप्त महिलाओं को उनके परिवारों से मिलवा चुकी हैं। सुजाता के पुनर्वास के साथ यह संख्या बढ़कर अब 43 हो गई है।
यह कहानी निश्चित रूप से मानव तस्करी और महिला क्रूरता जैसे संवेदनशील मुद्दों को उजागर करती है। मंदसौर की अनामिका जनकल्याण सेवा समिति और सीतामऊ पुलिस के त्वरित और मानवीय कार्य की बदौलत ही सुजाता को न्याय मिल पाया। उम्मीद है कि सुजाता अब अपने परिवार के साथ एक बार फिर से जिंदगी का नया और खुशहाल सफ़र शुरू करेंगी।
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