
चंदौली, उत्तर प्रदेश:
बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं के लिए नौकरी का सपना एक उम्मीद की किरण होता है, लेकिन जब यही सपना एक भयानक धोखे में बदल जाए, तो उसके परिणाम न केवल आर्थिक नुकसान बल्कि मानसिक पीड़ा भी लेकर आते हैं। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें एक युवक को न्यायालय में नौकरी दिलाने का झांसा देकर न केवल 29 लाख रुपये ठग लिए गए, बल्कि उसे एक फर्जी नियुक्ति पत्र देकर छह महीने तक काम भी करवाया गया।
यह मामला सकलडीहा कोतवाली क्षेत्र के देवरापुर गांव का है, जहां निवासी मनीष यादव नामक युवक ने न्याय की गुहार लगाई है। मनीष का कहना है कि उसे बिहार के एक न्यायालय में नौकरी दिलाने का वादा कर एक स्थानीय व्यक्ति और उसके साथियों ने उसे ठगी का शिकार बनाया।
चार साल पुरानी शुरुआत, ठगी की गहरी साजिश
मनीष के अनुसार, यह साजिश चार साल पहले रची गई थी। गांव के ही एक व्यक्ति ने पटना निवासी प्रशांत नामक व्यक्ति का हवाला देते हुए न्यायालय में क्लर्क की नौकरी का प्रस्ताव रखा। शुरुआत में मनीष से 12 लाख रुपये की मांग की गई। धीरे-धीरे यह राशि बढ़ते-बढ़ते 29 लाख तक पहुंच गई, जो किस्तों में वसूली गई।
जालसाजों ने न केवल पैसे लिए, बल्कि भरोसा जीतने के लिए मनीष को एक नियुक्ति पत्र भी सौंपा, जो बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के व्यवहार न्यायालय का बताया गया था। इस नियुक्ति पत्र के आधार पर मनीष ने छह महीने तक बतौर न्यायालय कर्मी काम भी किया। लेकिन चौंकाने वाली बात यह थी कि इस पूरे कार्यकाल में उसे एक भी रुपये वेतन नहीं मिला।
सच्चाई जानने के बाद उजड़ा सपना
जब वेतन न मिलने पर मनीष ने न्यायालय के अधिकारियों से संपर्क किया, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उसकी कोई नियुक्ति ही नहीं हुई थी और जो ज्वाइनिंग लेटर उसके पास है, वह फर्जी है।
मनीष अकेला शिकार नहीं था। जिले के तीन अन्य युवाओं के साथ भी यही धोखा हुआ था। सभी को नियुक्ति पत्र थमाकर न्यायालय भेजा गया था, जहां उन्होंने तीन से नौ महीने तक काम भी किया।
पुलिस कार्रवाई और प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल
इस धोखाधड़ी के उजागर होने के बाद मनीष ने सकलडीहा कोतवाली में सात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई। लेकिन छह महीने बीत जाने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासन की निष्क्रियता से निराश होकर अब मनीष ने चंदौली के पुलिस अधीक्षक (एसपी) से न्याय की गुहार लगाई है।
पत्रकारों से बातचीत में मनीष ने कहा, “मैंने अपनी पूरी जमा-पूंजी इस उम्मीद में लगाई थी कि एक सरकारी नौकरी मिलेगी। लेकिन धोखेबाजों ने मेरा सपना चकनाचूर कर दिया। अब मुझे सिर्फ न्याय चाहिए।”
युवा बेरोजगारों के लिए सबक
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा है, बल्कि एक बड़ा सबक भी है उन तमाम युवाओं के लिए जो नौकरी के लालच में बिना पूरी जांच-पड़ताल किए पैसे दे बैठते हैं। भारत में हर साल लाखों युवा सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं और इसी सपने को बेचने वाले गिरोह सक्रिय रहते हैं, जो फर्जी दस्तावेजों और झूठे वादों के सहारे युवाओं को ठगते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में युवाओं को सतर्क रहने की जरूरत है। कोई भी सरकारी नौकरी केवल सरकारी पोर्टल और वैध प्रक्रिया के जरिए ही प्राप्त की जा सकती है। किसी भी निजी व्यक्ति द्वारा नौकरी दिलाने का दावा करना, वह भी पैसे लेकर, अपने आप में एक बड़ा संदेहास्पद संकेत होता है।
साइबर क्राइम और आर्थिक अपराध शाखा से जांच की मांग
मनीष और अन्य पीड़ितों की ओर से अब यह मांग उठाई जा रही है कि मामले की जांच साइबर क्राइम और आर्थिक अपराध शाखा को सौंपी जाए, ताकि जालसाजों की पूरी नेटवर्क का पर्दाफाश हो सके। साथ ही, फर्जी नियुक्ति पत्र और अन्य दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच की मांग भी उठ रही है।
प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में पुलिस प्रशासन की धीमी कार्रवाई पर भी सवाल उठने लगे हैं। छह महीने तक एफआईआर के बावजूद कोई गिरफ्तारी न होना, न ही पूछताछ, यह दर्शाता है कि या तो मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया या फिर आरोपी रसूखदार हैं। अगर समय रहते कार्रवाई की जाती तो शायद अन्य पीड़ितों को यह धोखा नहीं झेलना पड़ता।
जब तक ठगों पर नकेल नहीं, तब तक खतरा बरकरार
चंदौली में सामने आया यह मामला एक बार फिर यह दर्शाता है कि जब तक फर्जीवाड़ा करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे गिरोह युवाओं के सपनों को यूं ही कुचलते रहेंगे। यह जरूरी है कि प्रशासन संवेदनशीलता दिखाए, मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों को सख्त सजा मिले।
साथ ही, समाज को भी जागरूक होना होगा, ताकि भविष्य में कोई और मनीष यादव इस तरह की ठगी का शिकार न हो।