विदिशा। मध्य प्रदेश के विदिशा से निकलकर अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में काम कर रहे युवा इंजीनियर और उद्यमी विभोर जैन ने अपनी तकनीकी पहल से शहर का नाम राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया है। 25 वर्षीय विभोर जैन की कंपनी व्योमिक निम्न पृथ्वी कक्षा, Low Earth Orbit, आधारित स्थिति निर्धारण, मार्गदर्शन और समय निर्धारण प्रणाली के लिए उपग्रह समूह विकसित कर रही है। कंपनी के पहले सैटेलाइट को वर्ष 2027 की तीसरी तिमाही में प्रक्षेपित करने की दिशा में काम चल रहा है। इससे पहले 2026 के अंत तक धरातलीय पेलोड का प्रदर्शन करने की योजना है। 
विभोर जैन और उनकी टीम ने अपनी तकनीक तथा कंपनी के विजन का प्रेजेंटेशन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के सामने दिया। विभोर के अनुसार, प्रधानमंत्री ने उनके काम की सराहना की। कंपनी का लक्ष्य भारत से ऐसा वैश्विक उपग्रह समूह विकसित करना है, जो रक्षा, दूरसंचार, ड्रोन, स्वचालित प्रणालियों और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए सटीक और सुरक्षित स्थिति निर्धारण, मार्गदर्शन तथा समय निर्धारण सेवाएं उपलब्ध कराए।
GPS से आगे PNT तकनीक की बढ़ती जरूरत
स्थिति निर्धारण, मार्गदर्शन और समय निर्धारण को PNT, यानी Positioning, Navigation and Timing, कहा जाता है। इसका इस्तेमाल केवल मोबाइल फोन या वाहन की लोकेशन पता करने तक सीमित नहीं है। आधुनिक तकनीक में ड्रोन, विमान, माल परिवहन, दूरसंचार, रक्षा प्रणालियों, स्वचालित मशीनों और विद्युत ढांचे के संचालन में सटीक स्थिति और समय की जानकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विशेष रूप से स्वचालित प्रणालियों में एक साथ काम करने वाली कई मशीनों के बीच सटीक तालमेल जरूरी होता है। इसके लिए भरोसेमंद स्थिति और समय संबंधी जानकारी की जरूरत होती है। विभोर जैन की टीम इसी तकनीकी चुनौती को ध्यान में रखते हुए निम्न पृथ्वी कक्षा आधारित उपग्रह व्यवस्था पर काम कर रही है।
विभोर के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था मौजूदा उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणालियों या भारत की नाविक व्यवस्था का स्थान लेने के लिए नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त तकनीकी परत के रूप में विकसित की जा रही है। पृथ्वी के अपेक्षाकृत करीब रहने वाले LEO उपग्रहों से मजबूत संकेत और अधिक सटीक स्थिति निर्धारण की संभावनाएं जुड़ी हैं।
कंपनी उपग्रह की सटीक कक्षा निर्धारण प्रणाली, उपग्रहों के बीच संचार व्यवस्था और परमाणु घड़ी समूह जैसी तकनीकों पर भी काम कर रही है। इन तकनीकों का उद्देश्य उपग्रह आधारित PNT सेवाओं की सटीकता और विश्वसनीयता को बेहतर बनाना है।
ड्रोन से शुरू हुई सैटेलाइट की कहानी
विभोर जैन के अनुसार, सैटेलाइट आधारित नेविगेशन तकनीक पर काम करने की शुरुआत ड्रोन तकनीक से जुड़ी चुनौती के बाद हुई। IIT मद्रास की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने लोकेश कबदाल और अनुराग पाटिल के साथ ड्रोन समूह तकनीक पर काम शुरू किया।
टीम ने करीब 55 से 60 ड्रोन विकसित किए। इन ड्रोन का प्रदर्शन गुजरात के मुख्यमंत्री और पुडुचेरी सरकार के लिए भी किया गया। बड़ी संख्या में ड्रोन को स्वायत्त तरीके से संचालित करने के दौरान टीम के सामने एक महत्वपूर्ण तकनीकी चुनौती आई।
केवल बेहतर ड्रोन हार्डवेयर पर्याप्त नहीं था। प्रत्येक ड्रोन की स्थिति और समय की जानकारी भी पर्याप्त सटीक होना जरूरी था। इसी समस्या ने टीम को उपग्रह आधारित मार्गदर्शन की तकनीकी जरूरत पर काम करने के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर इसी दिशा में व्योमिक की शुरुआत हुई।
कारगिल युद्ध से जुड़ी स्वदेशी नेविगेशन की जरूरत
विभोर जैन भारत की स्वदेशी उपग्रह आधारित नेविगेशन क्षमता के विकास को 1999 के कारगिल युद्ध से जुड़ी जरूरतों के संदर्भ में देखते हैं। उनके अनुसार, उस समय सैन्य अभियानों के लिए भारत को उपग्रह आधारित मार्गदर्शन की आवश्यकता थी, लेकिन अमेरिका ने आधुनिक GPS सुविधा देने से इनकार कर दिया था।
इसके बाद भारत ने अपनी उपग्रह आधारित नेविगेशन क्षमता विकसित करने की दिशा में काम आगे बढ़ाया और आगे चलकर नाविक प्रणाली अस्तित्व में आई। विभोर की टीम अब भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग कक्षाओं और तकनीकों पर आधारित प्रणालियों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।
विदिशा से IIT मद्रास और अब अंतरिक्ष तकनीक तक सफर
विभोर जैन मूल रूप से विदिशा के रहने वाले हैं। वे डॉ. केसी जैन और डॉ. अर्चना जैन के पुत्र हैं। डॉ. केसी जैन विदिशा में गरिमा मेडिकल्स का संचालन करते हैं, जबकि डॉ. अर्चना जैन एसएल जैन पीजी कॉलेज में प्रोफेसर हैं।
विभोर ने कक्षा 10वीं तक की पढ़ाई विदिशा के ट्रिनिटी कॉन्वेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल से की। इसके बाद उन्होंने कोटा से 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की। आगे उन्होंने IIT मद्रास से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया।
IIT मद्रास के दौरान विभोर ने टीम अविष्कार हाइपरलूप का नेतृत्व किया। टीम ने भारतीय रेलवे और बड़े कॉरपोरेट संस्थानों से 10 करोड़ रुपये से अधिक की फंडिंग हासिल की। टीम को तीन अंतरराष्ट्रीय पेटेंट भी मिले और दुनिया की हाइपरलूप टीमों में शीर्ष तीन में स्थान मिला।
विभोर के स्कूल साथी प्रसंग जैन के अनुसार, विदिशा के किसी युवा का सैटेलाइट निर्माण के क्षेत्र में आगे बढ़ना शहर के लिए गौरव की बात है।
अब विभोर जैन और उनकी टीम की नजर 2027 पर है। पहले चरण में 2026 के अंत तक धरातलीय पेलोड प्रदर्शन और उसके बाद 2027 की तीसरी तिमाही में पहले सैटेलाइट के प्रक्षेपण की तैयारी की जा रही है। यदि योजना निर्धारित दिशा में आगे बढ़ती है, तो विदिशा का नाम भारत की निजी अंतरिक्ष तकनीक और नेविगेशन क्षेत्र की नई पहलों से जुड़ता दिखाई देगा।
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