मऊगंज: एक तरफ जहाँ देश और प्रदेश में दिव्यांगों के कल्याण और उनके अधिकारों के लिए सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहीं मऊगंज जिले में प्रशासनिक संवेदनहीनता का एक ऐसा चेहरा सामने आया है, जिसने व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यहाँ एक दिव्यांग पत्रकार की पीड़ा को सुनने के बजाय प्रशासनिक अमला 'दंबगई' पर उतर आया है।
क्या है पूरा मामला?
80 प्रतिशत दिव्यांग पत्रकार दीपक कुमार गुप्ता लंबे समय से सामाजिक सुरक्षा पेंशन को लेकर संघर्षरत हैं। उनकी मांगें बहुत साधारण हैं—पेंशन मिलने की एक निश्चित तारीख तय हो और महंगाई के इस दौर में 600 रुपये की नाकाफी राशि में वृद्धि की जाए।
जब दीपक गुप्ता ने अपनी मांगों का आवेदन लेकर मऊगंज अनुविभागीय अधिकारी (SDM) से संपर्क किया, तो उन्हें जो जवाब मिला, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। फोन पर बातचीत के दौरान जब दिव्यांग पत्रकार ने आवेदन की पावती (Receipt) मांगी, तो SDM ने दोटूक लहजे में कह दिया, “आपका आवेदन स्वीकार नहीं होगा। हम काम करवा रहे हैं, आप बार-बार पैसे खर्च करके क्यों आ रहे हो?”
‘चाहे मुकदमे हों या मौत, अब पीछे नहीं हटेंगे’
जब दीपक ने बताया कि पेंशन न आने के कारण वे मंगलवार से अनशन पर बैठेंगे, तो अधिकारी की बेरुखी और बढ़ गई। अधिकारी ने साफ कहा, “चाहे जो करो, शासन से पैसा आना है तभी आएगा, आपका आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
इस अपमानजनक व्यवहार के बाद दीपक गुप्ता ने टूट जाने के बजाय 'आर-पार' की लड़ाई का संकल्प लिया है। उन्होंने भावुक होकर कहा, “चाहे प्रशासन मेरे खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दे या रिपोर्ट लिखवा दे, मुझे फर्क नहीं पड़ता। अब या तो न्याय मिलेगा या फिर इस अनशन में मेरी जान ही क्यों न चली जाए। ऐसी सुविधाओं के अभाव में घुट-घुट कर जीने से बेहतर है कि मैं अपने हक के लिए प्राण त्याग दूं।”
समाजसेवियों से मांगी मदद
दीपक गुप्ता ने मऊगंज के जागरूक नागरिकों, समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों से इस लड़ाई में साथ आने की अपील की है। उन्होंने कहा, “मंगलवार से कलेक्ट्रेट के सामने मेरा अनशन शुरू होगा। मुझे आंदोलन के लिए एक पंडाल (टेंट) की सख्त जरूरत है। मैं चाहता हूँ कि शहर का कोई सहृदय व्यक्ति आगे आए और इस न्याय की लड़ाई में मेरा सहयोग करे।”
क्या प्रशासन अब भी जागेगा?
एक दिव्यांग की आवाज को अनसुना करना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह लोकशाही के सिद्धांतों के भी विपरीत है। मऊगंज का यह मामला अब जिले में चर्चा का विषय बन गया है। अब सवाल यह उठता है कि क्या मऊगंज कलेक्टर इस मामले में संज्ञान लेंगे? क्या जिला प्रशासन अपनी तानाशाही छोड़कर एक दिव्यांग की वाजिब समस्याओं का निराकरण करेगा, या फिर इस आंदोलन को दबाने की कोशिश की जाएगी?
पूरे मऊगंज की नजर अब मंगलवार की सुबह पर टिकी है। क्या सिस्टम का दिल पिघलेगा या दीपक गुप्ता का संघर्ष इतिहास रचेगा? 'विदिशा भारती' इस खबर पर लगातार नजर बनाए हुए है।
Leave a comment
Your email address will not be published. Required fields are marked *