जबलपुर। मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित बरगी डैम की लहरें शुक्रवार को उस वक्त मातम में बदल गईं, जब एक हंसते-खेलते पर्यटन सफर का अंत लाशों के ढेर के साथ हुआ। SDRF द्वारा 5 और शव बरामद किए जाने के बाद अब तक कुल 9 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 4 अन्य की तलाश जारी है। लेकिन यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है; यह कहानी है उस आपराधिक लापरवाही की, जिसने चंद रुपयों के लालच में मासूमों को मौत के मुँह में धकेल दिया।
'मौत के पैकेट': जब सुरक्षा ही बन गई काल
इस हादसे का सबसे डरावना और शर्मनाक पहलू वह वीडियो है, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि क्रूज जब डूब रहा था, तब सुरक्षा के लिए रखी गई लाइफ जैकेट्स प्लास्टिक की सीलबंद पन्नियों में कैद थीं। कल्पना कीजिए, लहरें उफान पर थीं, जहाज डगमगा रहा था और क्रूज के कर्मचारी पागलों की तरह उन पन्नियों को दांतों और नाखूनों से फाड़ने की कोशिश कर रहे थे। जिस सुरक्षा उपकरण को यात्रियों के शरीर पर होना चाहिए था, वे अलमारियों में शो-पीस बने रहे। यात्रियों को सुरक्षा नहीं, बल्कि 'मौत के पैकेट' थमाए गए थे।
माँ की ममता बनाम सिस्टम की क्रूरता
हादसे के बीच से निकलकर आई एक तस्वीर पत्थर दिल इंसान को भी रुला दे। एक माँ, जो खुद डूब रही थी, उसने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने बच्चे को इकलौती उपलब्ध लाइफ जैकेट में लपेट दिया। वह आखिरी सांस तक अपने कलेजे के टुकड़े को लहरों से बचाने की जद्दोजहद करती रही।
एक तरफ माँ की ममता का संघर्ष था, तो दूसरी तरफ प्रबंधन की वो निर्दयता, जिसने मौसम विभाग के 'ऑरेंज अलर्ट' और तेज हवाओं की चेतावनी को ताक पर रखकर क्रूज को बीच मझधार में उतार दिया। क्या उन मासूमों की चीखें प्रशासन के कानों तक पहुँचेगी?
30 मिनट का वो खौफनाक मंजर
चश्मदीदों की मानें तो क्रूज करीब 30 मिनट तक लहरों से टकराता रहा। लोग मदद के लिए चिल्लाते रहे, लेकिन क्रूज पर न तो कोई इमरजेंसी लाइफ-बोट थी और न ही कोई प्रशिक्षित रेस्क्यू गार्ड। प्रशासन की मुस्तैदी का आलम यह था कि जब तक बचाव दल पहुँचा, बरगी की लहरें कई चिरागों को बुझा चुकी थीं।
बड़ा सवाल: क्या प्रशासन हर बार की तरह कुछ छोटे कर्मचारियों को सस्पेंड करके इस 'सामूहिक हत्याकांड' की फाइल बंद कर देगा? उन रसूखदारों पर कार्रवाई कब होगी, जिन्होंने सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाईं?
जांच के नाम पर खानापूर्ति या न्याय?
हादसे के बाद अब राजनैतिक रोटियां सेंकने और जांच कमेटियां बिठाने का दौर शुरू हो गया है। लेकिन सवाल वही है—क्या उन 9 परिवारों को उनका खोया हुआ सदस्य वापस मिलेगा? जबलपुर का यह क्रूज हादसा चीख-चीख कर कह रहा है कि अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो पर्यटन के नाम पर ऐसी 'जल समाधियां' बनती रहेंगी।
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