विदिशा। क्या रिश्तों में इतनी कड़वाहट आ सकती है कि एक पत्नी को अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए भीख मांगनी पड़े? यह हृदयविदारक घटना किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि विदिशा की कड़वी सच्चाई है। लेकिन कहते हैं न कि जब अपनों के दरवाजे बंद हो जाते हैं, तब कानून और संवेदना के रास्ते खुलते हैं। विदिशा पुलिस की 'सीनियर सिटीजन पुलिस पंचायत' आज जिले के हजारों बुजुर्गों के लिए एक ढाल बनकर खड़ी है।
हाल ही में आयोजित पंचायत की बैठक में कुछ ऐसे मामले सामने आए, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं।
बेटों की बेरुखी और भीख मांगकर किया अंतिम संस्कार
एक सेवानिवृत्त शासकीय कर्मचारी की पत्नी का दर्द सुनकर पंचायत में सन्नाटा पसर गया। पति की मौत के बाद जिन बेटों का सहारा होना चाहिए था, उन्होंने ही मां को बेघर करने की साजिश रच डाली। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि वृद्धा को पति का अंतिम संस्कार करने के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाना पड़ा। अब वही बेटे मकान पर अपना कब्जा जमाना चाहते थे।
पंचायत की कोर कमेटी ने कड़ा रुख अपनाते हुए दोनों पक्षों को तलब किया। कानूनी पेच और मानवीय मूल्यों की समझाइश का असर हुआ। अब उस वृद्धा को उसी घर में सम्मान के साथ रहने का हक मिला है। पंचायत ने स्पष्ट किया कि वृद्धा को प्रताड़ित करने पर कानूनी कार्रवाई होगी।
भरण-पोषण और मारपीट: पारिवारिक कलह का अंत
विदिशा की इस पंचायत में केवल एक नहीं, बल्कि 08 गंभीर प्रकरणों की सुनवाई हुई:
कुरवाई का मामला: एक पिता ने शिकायत की कि चार बेटों ने धोखे से जमीन हड़प ली और अब उन्हें भूखा मरने के लिए छोड़ दिया। पंचायत ने कड़ा फैसला सुनाते हुए चारों बेटों को ₹2,000 प्रति माह भरण-पोषण राशि देने का आदेश दिया, जिसे बेटों को मानना पड़ा।
शमशाबाद का विवाद: मारपीट और हथियारों से धमकाने जैसे संगीन मामले में पंचायत ने बीच का रास्ता निकाला। कमरे के विवाद को आर्थिक मूल्यांकन और आपसी समझौते से सुलझाया गया, जिससे परिवार बिखरने से बच गया।
मिठाई से हुई नई शुरुआत: गंजबासौदा में सालों से चल रहा भाइयों का विवाद आखिरकार हंसी-खुशी खत्म हुआ। एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर दोनों पक्षों ने पुराने गिले-शिकवे मिटा दिए।
सीनियर सिटीजन पंचायत: बुजुर्गों की 'नई उम्मीद'
पुलिस अधीक्षक रोहित काशवानी के निर्देशन और एएसपी डॉ. प्रशांत चौबे के मार्गदर्शन में काम कर रही यह पंचायत आज एक 'जन-अदालत' बन गई है। कोर कमेटी के सदस्य आर. कुलश्रेष्ठ, प्रमोद व्यास, डॉ. सचिन गर्ग, अजय टंडन, डी.के. वाजपेयी, विनोद साह और पार्थ पितालिया की मौजूदगी में यह साबित हुआ कि कानून का डर और अपनों की समझाइश रिश्तों को टूटने से बचा सकती है।
विदिशा पुलिस का यह अनूठा प्रयोग न केवल बुजुर्गों को कानूनी न्याय दिला रहा है, बल्कि समाज में खो रही पारिवारिक मर्यादाओं को भी पुनर्जीवित कर रहा है। आने वाले समय में यह पंचायत और भी अधिक सक्रिय होकर ऐसे मामलों का निपटारा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
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