भोपाल। सरकारी खरीद में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए GeM (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) पोर्टल की एक बिड अब सवालों के घेरे में आ गई है। मामले के अनुसार शासकीय नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्नातकोत्तर महाविद्यालय की बिड GEM/2025/B/6874621 के बायर प्रमोद कुमार खरे को लेकर दायर एक आरटीआई आवेदन के माध्यम से ऐसी जानकारियां मांगी हैं, जिनके जवाब आने के बाद पूरी खरीद प्रक्रिया की परतें खुल सकती हैं।

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि बिड में L-1, L-2 और L-3 घोषित तीनों फर्मों के उत्पादों का निर्माता कथित रूप से एक ही है। अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जब उत्पाद का स्रोत एक ही है तो आखिर तीनों बोलीदाताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का आधार क्या था और मूल्यांकन की प्रक्रिया किस प्रकार अपनाई गई?
क्या कागजों में हुई प्रतिस्पर्धा या वास्तव में था मुकाबला?
सरकारी खरीद प्रणाली का मूल उद्देश्य अधिक से अधिक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से बेहतर दरों पर सामग्री प्राप्त करना होता है। लेकिन यदि एक ही निर्माता से जुड़े उत्पादों वाली फर्में अलग-अलग श्रेणियों में L-1, L-2 और L-3 बनती हैं तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या मूल्यांकन पूरी तरह नियमों के अनुरूप हुआ और क्या सभी बोलीदाताओं की पात्रता की समान रूप से जांच की गई?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत किया गया है।
RTI में मांगे गए ये अहम दस्तावेज,
आवेदक ने लोक सूचना अधिकारी से मांग की है कि बताया जाए—
* बिड किस नियम, शासनादेश अथवा GeM दिशा-निर्देश के आधार पर जारी की गई?
* तकनीकी और वित्तीय पात्रता की शर्तें किसके आदेश से निर्धारित हुईं?
* L-1, L-2 और L-3 घोषित फर्मों द्वारा प्रस्तुत मूल दस्तावेजों और प्रमाण-पत्रों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं।
* यदि तीनों फर्मों का निर्माता एक ही है तो ऐसी स्थिति में अपनाई गई मूल्यांकन प्रक्रिया और नियमों की जानकारी दी जाए।
इस पूरे मामले में अभी तक किसी प्रकार की अनियमितता सिद्ध नहीं हुई है, लेकिन आरटीआई आवेदन ने कई ऐसे प्रश्न जरूर खड़े कर दिए हैं जिनका उत्तर केवल आधिकारिक रिकॉर्ड ही दे सकता है। विशेष रूप से उन दस्तावेजों का खुलासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिनके आधार पर तीनों फर्मों को L-1, L-2 और L-3 का दर्जा दिया गया।
खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर टिकी निगाहें
GeM पोर्टल को पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त खरीद व्यवस्था के रूप में स्थापित किया गया था। ऐसे में यदि एक ही निर्माता से जुड़े उत्पादों वाली फर्मों को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो जवाब भी उतने ही स्पष्ट और दस्तावेजी होने चाहिए।
अब सबकी निगाहें सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए जवाबों पर हैं। यदि रिकॉर्ड में सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो तस्वीर साफ हो जाएगी, लेकिन यदि दस्तावेजों में कोई विसंगति सामने आती है तो यह मामला केवल एक बिड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी खरीद व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकता है।
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