इंदौर | विदिशा भारती न्यूज डेस्क
मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से एक बेहद दिलचस्प और बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। नगर निगम द्वारा आनन-फानन में की गई सीलिंग की कार्रवाई पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए एक एडवोकेट के सील कार्यालय को "तत्काल—फौरन" खोलने के सख्त आदेश जारी किए हैं। सबसे खास बात यह रही कि हाई कोर्ट में अवकाश (छुट्टी) होने के बावजूद मामले की गंभीरता और अर्जेंसी को देखते हुए विशेष अनुमति से यह इमरजेंसी सुनवाई आयोजित की गई थी। इस फैसले के बाद इंदौर नगर निगम और प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।
छुट्टी के दिन लगी अदालत, वकीलों ने दी तीखी दलीलें
पूरा मामला इंदौर के व्यस्ततम इलाके एम.पी. रोड स्थित एक व्यावसायिक भवन का है, जहाँ याचिकाकर्ता अमित रावल अपना एडवोकेट ऑफिस संचालित करते हैं। इंदौर नगर निगम की टीम ने बिना किसी पूर्व चेतावनी या व्यक्तिगत नोटिस दिए उनके दफ्तर पर ताला जड़ दिया और पूरे परिसर को सील कर दिया।
नगर निगम की इस अचानक हुई कार्रवाई से नाराज होकर याचिकाकर्ता ने तुरंत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट में आधिकारिक अवकाश होने के कारण विशेष अनुमति (स्पेशल परमिशन) लेकर अर्जेंट याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट अंशुल हार्डिया ने जोरदार पैरवी की, जबकि जिरह के दौरान एडवोकेट रितेश इनानी भी कोर्ट में मुस्तैद रहे।
“सोमवार को कोर्ट में केस लगे हैं, दफ्तर बंद रहा तो न्याय कैसे मिलेगा?”
अदालत के समक्ष बहस करते हुए एडवोकेट अंशुल हार्डिया ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता अमित रावल हाई कोर्ट और जिला अदालतों में नियमित रूप से प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता हैं। नगर निगम द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के दफ्तर को सील कर दिए जाने से उनका पूरा व्यावसायिक और कानूनी कामकाज ठप हो गया है।
वकील ने कोर्ट को बताया कि आने वाले सोमवार को विभिन्न न्यायालयों में उनके कई महत्वपूर्ण प्रकरण (केस) सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं। दफ्तर बंद होने के कारण न तो वे कानूनी फाइलों तक पहुँच पा रहे हैं और न ही अपने पक्षकारों (क्लाइंट्स) के मामलों की तैयारी कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आम न्याय प्रार्थी नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा है।
फायर सेफ्टी का सच: सोसायटी की गलती की सजा वकील क्यों भुगते?
सुनवाई के दौरान सीलिंग की असली वजह भी सामने आई। बताया गया कि जिस बिल्डिंग में वकील का दफ्तर है, उसकी बिल्डिंग सोसायटी द्वारा अग्नि सुरक्षा (फायर सेफ्टी) संबंधी मानकों और नोटिसों का पालन नहीं किया गया था। इसी आधार पर नगर निगम ने पूरी इमारत को सील कर दिया था।
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने जोरदार जवाब देते हुए कहा कि बिल्डिंग सोसायटी को मिले नोटिस की जानकारी व्यक्तिगत रूप से दफ्तर चालकों या दुकानदारों को नहीं दी गई थी। इसके अलावा, याचिकाकर्ता एडवोकेट ने खुद जागरूक नागरिक का परिचय देते हुए अपने दफ्तर में सभी आवश्यक अग्नि सुरक्षा उपकरण (Fire Safety Equipment) पहले से ही स्थापित कर रखे हैं। ऐसे में बिना किसी गलती के उनके निजी दफ्तर को सील करना पूरी तरह गैर-कानूनी है।
जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की एकलपीठ का आदेश— “सील हटाओ!”
मामले में प्रस्तुत तर्कों और स्थिति की अर्जेंसी को समझते हुए न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को बड़ी अंतरिम राहत प्रदान की। हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि याचिकाकर्ता एडवोकेट अमित रावल के कार्यालय पर लगाई गई सील को "तत्काल और फौरन" हटाया जाए।
जनहित भी सर्वोपरि: सोसायटी को 2 हफ्ते की मोहलत
हालांकि, हाई कोर्ट ने केवल राहत देकर ही बात खत्म नहीं की, बल्कि फायर सेफ्टी जैसे गंभीर जनहित के मुद्दे पर भी कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने माना कि आग से सुरक्षा आम नागरिकों के जीवन से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसलिए न्यायालय ने संबंधित भवन सोसायटी को निर्देश दिए कि वे तुरंत आवश्यक अग्नि सुरक्षा उपाय लागू करें और दो सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष अपना जवाब प्रस्तुत करें।
इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि प्रशासनिक अमला अपनी मनमानी से आम नागरिकों या पेशेवरों का काम नहीं रोक सकता। इंदौर में इस त्वरित अदालती फैसले की कानूनी गलियारों में जमकर सराहना हो रही है।
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