सांची। त्याग, समर्पण और अटूट आस्था का पर्व ईदुल अजहा (बकरीद) आज ऐतिहासिक नगरी सांची में पूरे हर्षोल्लास और धार्मिक अकीदत के साथ मनाया गया। नगर की एकमात्र जामा मस्जिद में सुबह से ही रौनक देखते ही बन रही थी। सफेद लिबास पहने, सिर पर टोपी सजाए नमाजी जब खुदा की बारगाह में सजदा करने पहुंचे, तो पूरा माहौल रूहानी सुकून से भर गया।
मुल्क की तरक्की के लिए उठे सैकड़ों हाथ
निश्चित समय सुबह 7:45 बजे मस्जिद के आंगन में नमाज शुरू हुई। मौलाना मकसूद साहब ने नमाज अदा कराई, जिसके बाद खुतबा पढ़ा गया। नमाज के समापन पर एक भावुक मंजर देखने को मिला जब सैकड़ों हाथ एक साथ आसमान की ओर उठे। हर जुबां पर एक ही दुआ थी— “ऐ मालिक! हमारे मुल्क में अमन-चैन कायम रख और तरक्की की राहें खोल दे।”
कुरान और हदीस की रोशनी में दी गई तकरीर
नमाज से पूर्व मौलाना मकसूद साहब ने कुरान और हदीस की रोशनी में इस्लाम के शांतिपूर्ण संदेश पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह पर्व केवल रस्म नहीं, बल्कि खुदा की राह में अपना सब कुछ न्यौछावर करने के जज्बे का प्रतीक है। वहीं, हाफिज अफसार साहब ने ईदुल अजहा की महत्ता और कुर्बानी के सही अर्थों को विस्तार से समझाया।
गंगा-जमुनी तहजीब की दिखी झलक
सांची की यह ईद आपसी भाईचारे की मिसाल बन गई। नमाज के बाद जहां मुस्लिम भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद दी, वहीं नगर के हिंदू भाइयों ने भी मस्जिद पहुंचकर अपने मुस्लिम मित्रों को गले लगाया। यह नजारा भारत की साझी संस्कृति और 'गंगा-जमुनी तहजीब' को जीवंत कर रहा था।
प्रशासन रहा मुस्तैद, स्वच्छता की अपील
सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क दिखा। थाना प्रभारी जेपी त्रिपाठी भारी पुलिस बल के साथ मस्जिद परिसर में मौजूद रहे। उन्होंने सभी को ईद की बधाई देते हुए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया:
“यह पर्व कुर्बानी और सौहार्द का है। हम सभी को मिल-जुलकर इसे मनाना है। साथ ही, कुर्बानी के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें ताकि शहर साफ-सुथरा बना रहे।”
घरों में हुई सुन्नत-ए-इब्राहिमी की अदायगी
नमाज और दुआओं के दौर के बाद लोग अपने घरों की ओर रवाना हुए, जहां सुन्नत-ए-इब्राहिमी पर अमल करते हुए अल्लाह की राह में कुर्बानी दी गई। घरों में लजीज पकवानों का दौर शुरू हुआ और मेहमानों के स्वागत-सत्कार का सिलसिला देर शाम तक जारी रहा।
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