रतलाम: कहते हैं कि प्रकृति का श्रृंगार ही सबसे बड़ा उपहार है। इसी मंत्र को आत्मसात करते हुए रतलाम के पर्यावरण प्रेमियों ने रविवार को एक मिसाल पेश की। जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित आस्था और श्रद्धा के केंद्र 'कंवलका माताजी' मंदिर की सूनी और बंजर पहाड़ी अब जल्द ही हरियाली की चादर ओढ़ती नजर आएगी। पर्यावरण संरक्षण के महाअभियान के तहत यहाँ एक साथ 2.25 लाख से अधिक बीजों का रोपण किया गया है।
जज्बे के आगे फीकी पड़ी बारिश
रविवार सुबह जब यह अभियान शुरू हुआ, तो आसमान में बादलों का डेरा था और हल्की बारिश भी हो रही थी। लेकिन प्रकृति के प्रति समर्पित इन स्वयंसेवकों के हौसले के आगे बारिश की बूंदें भी नतमस्तक हो गईं। 'कणव-वन सेवा संस्थान' के तत्वावधान में आयोजित इस अनूठे बीजारोपण अभियान में उम्र की कोई सीमा नहीं थी। नन्हे स्कूली बच्चों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक, हर किसी के हाथ में बीज थे और दिल में एक ही संकल्प—"पहाड़ को हरा-भरा बनाना है।"
जन-भागीदारी की अनोखी मिसाल
इस अभियान की सबसे खास बात इसकी व्यापक जन-भागीदारी रही। सातरुंडा, रत्तागढ़खेड़ा, सिमलावदा, सुजलाना, रत्तागिरी, प्रीतमनगर और दंतोड़िया सहित आसपास के कई गांवों के ग्रामीणों ने एकजुट होकर इस महायज्ञ में अपनी आहुति दी। युवाओं की ऊर्जा और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने इस कार्यक्रम को एक उत्सव में बदल दिया।
क्यों खास है यह अभियान?
संस्थान के पदाधिकारियों का मानना है कि केवल पेड़ लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें संरक्षित करना भी जरूरी है। बीज बम और पारंपरिक रोपण तकनीक के माध्यम से यहाँ ऐसी प्रजातियों के बीजों को बोया गया है जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल हैं और भविष्य में यहाँ एक सघन 'मिनी फॉरेस्ट' (वन क्षेत्र) तैयार करेंगी।
पर्यावरण का कायाकल्प: पहाड़ी क्षेत्र में हरियाली बढ़ने से भू-जल स्तर में सुधार होगा।
जैव विविधता: नए पेड़-पौधे लगने से यहाँ के स्थानीय पक्षियों और जीवों के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध होगा।
श्रद्धा और प्रकृति का मेल: कंवलका माताजी मंदिर आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए यह पहाड़ी आने वाले वर्षों में सुखद और ठंडी छांव का अनुभव कराएगी।
आने वाली पीढ़ी को सौंपी ‘हरी विरासत’
आयोजन में शामिल हुए ग्रामीणों ने बताया कि वे लंबे समय से इस पहाड़ी को हरा-भरा देखना चाहते थे। "हम आने वाली पीढ़ी को कंक्रीट के जंगल नहीं, बल्कि शुद्ध हवा और हरियाली की विरासत सौंपना चाहते हैं," यह कहना था उन युवाओं का, जो कीचड़ और बारिश की परवाह किए बिना पहाड़ी की ढलानों पर बीज रोप रहे थे।
यह अभियान केवल एक दिन का काम नहीं है, बल्कि यह रतलाम के निवासियों द्वारा पर्यावरण के प्रति ली गई एक दीर्घकालिक शपथ है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मानसून की बारिश के साथ ये बीज कब अंकुरित होकर पहाड़ी को नया रूप देंगे।
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