भोपाल। मध्यप्रदेश में टोल व्यवस्था अब आधुनिक तकनीक की ओर तेजी से बढ़ रही है। प्रदेश में पहली बार बैरियर-लेस टोलिंग सिस्टम (SLFF) का पायलट परीक्षण शुरू किया गया है। भोपाल–देवास मार्ग स्थित फंदा टोल प्लाजा पर शुरू हुए इस परीक्षण के सफल होने पर टोल प्लाजा पर वाहनों को रोकने की जरूरत काफी हद तक खत्म हो सकती है।
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वाहन बिना बूम बैरियर पर रुके टोल प्लाजा से गुजर सकेंगे। इससे टोल नाके पर लगने वाली कतार, अनावश्यक ब्रेकिंग और वाहन चालकों के समय की बर्बादी कम होने की उम्मीद है। सरकार का दावा है कि इस तकनीक से यात्रियों के समय के साथ ईंधन की भी बचत होगी।
लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह के सामने हुआ प्रस्तुतीकरण
मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम के अधिकारियों ने बैरियर-लेस टोलिंग की तकनीक और उसके क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया का प्रस्तुतीकरण लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह के सामने किया।
प्रस्तुतीकरण के बाद मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि व्यवस्था को प्राथमिकता के आधार पर निर्धारित समय-सीमा में लागू करने की दिशा में काम किया जाए। साथ ही पायलट परीक्षण से प्राप्त परिणामों का व्यवस्थित मूल्यांकन करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
सरकार अब यह देखेगी कि नई तकनीक वास्तविक परिस्थितियों में कितनी प्रभावी रहती है, वाहनों की पहचान कितनी सटीक होती है और यात्रियों को इससे कितना फायदा मिलता है।
क्या है बैरियर-लेस टोलिंग?
फिलहाल अधिकांश टोल प्लाजा पर वाहन टोल लेन में पहुंचते हैं, उनकी गति कम होती है और बूम बैरियर खुलने के बाद वाहन आगे बढ़ता है। इससे कई बार वाहनों की लंबी कतार लग जाती है।
बैरियर-लेस टोलिंग में वाहन को टोल प्लाजा पर रुकने की जरूरत नहीं होगी। वाहन चलते हुए टोल लेन से गुजरेगा और तकनीकी सिस्टम उसकी पहचान करके संबंधित टोल राशि की प्रक्रिया पूरी करेगा।
इसका उद्देश्य टोल प्लाजा को अधिक सुगम, तेज और निर्बाध बनाना है।
चलते वाहन से अपने आप कटेगा टोल
नई व्यवस्था में चलते वाहन की स्वतः पहचान, वाहन का वर्गीकरण और फास्टेग से जुड़े विवरण के आधार पर टोल राशि का संग्रह किया जाएगा।
जानकारी के मुताबिक वाहन करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से गुजरते हुए भी टोल प्लाजा को पार कर सकेगा। इसका मतलब यह है कि वाहन को पारंपरिक तरीके से टोल बैरियर के सामने रोकने की आवश्यकता नहीं होगी।
इससे बार-बार ब्रेक लगाने और फिर वाहन को गति देने में खर्च होने वाले ईंधन की बचत हो सकती है। साथ ही टोल प्लाजा पर ट्रैफिक दबाव कम करने में भी मदद मिलेगी।
कैमरों और सेंसर की पूरी तकनीकी व्यवस्था
फंदा टोल प्लाजा की SLFF लेन में कई आधुनिक तकनीकी उपकरण लगाए गए हैं। इनमें फास्टेग/RFID रीडर, हाई-रिजॉल्यूशन ANPR कैमरे, वाहन डिटेक्शन एवं क्लासिफिकेशन सेंसर, लेन कंट्रोलर और ट्रांजैक्शन प्रोसेसिंग सिस्टम शामिल हैं।
वाहन के लेन से गुजरते ही सिस्टम पहले वाहन की पहचान करेगा। इसके बाद वाहन की श्रेणी निर्धारित की जाएगी और संबंधित टोल राशि की गणना की जाएगी। फास्टेग से जुड़ी प्रक्रिया के जरिए टोल राशि काटने का काम पूरा होगा।
यानी वाहन चालक को टोल बूथ पर रुककर किसी कर्मचारी से भुगतान करने या बैरियर खुलने का इंतजार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
फास्टेग में बैलेंस नहीं तो क्या होगा?
नई व्यवस्था में फास्टेग से संबंधित तकनीकी समस्याओं के लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था रखी गई है।
यदि फास्टेग खाते में पर्याप्त बैलेंस नहीं है, वाहन का पंजीकरण नंबर गलत दर्ज है या किसी तकनीकी कारण से टोल राशि तत्काल प्राप्त नहीं हो पाती है, तो संबंधित वाहन को ई-चालान के माध्यम से टोल राशि की सूचना दी जाएगी।
निर्धारित समय में राशि जमा नहीं करने की स्थिति में नियमानुसार पेनल्टी सहित वसूली की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैरियर-लेस सिस्टम में भी टोल संग्रह की प्रक्रिया प्रभावी बनी रहे।
अभी एक लेन में हो रहा पायलट परीक्षण
फिलहाल फंदा टोल प्लाजा की एक लेन में बैरियर-लेस टोलिंग का पायलट परीक्षण किया जा रहा है। इस दौरान तकनीक की कार्यक्षमता, वाहन पहचान, टोल संग्रह और यातायात संचालन जैसे विभिन्न पहलुओं का परीक्षण किया जाएगा।
परीक्षण के दौरान मिलने वाले आंकड़ों और अनुभवों का मूल्यांकन किया जाएगा। इसके आधार पर आगे इसे बड़े स्तर पर लागू करने का निर्णय लिया जाएगा।
1 जनवरी 2027 से तीनों टोल प्लाजा में विस्तार की योजना
पायलट प्रोजेक्ट सफल रहने पर 1 जनवरी 2027 से भोपाल–देवास मार्ग के तीनों टोल प्लाजा की सभी लेनों में बैरियर-लेस टोलिंग लागू करने की योजना है।
इसके बाद प्रदेश के अन्य उपयुक्त टोल प्लाजा पर भी इस तकनीक को लागू करने की कार्ययोजना तैयार की जा सकती है। सरकार का उद्देश्य धीरे-धीरे टोलिंग व्यवस्था को ऐसी तकनीक से जोड़ना है, जिसमें वाहनों को कम से कम रुकना पड़े।
समय और ईंधन दोनों की बचत पर जोर
बैरियर-लेस टोलिंग को सिर्फ टोल संग्रह की तकनीक में बदलाव के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे सड़क यात्रा को अधिक सुविधाजनक बनाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
टोल प्लाजा पर वाहनों की कतार कम होने से यात्रा का समय बच सकता है। बार-बार ब्रेक लगाने और वाहन को दोबारा गति देने की जरूरत कम होने से ईंधन की खपत पर भी सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।
मंत्री राकेश सिंह ने अधिकारियों को पायलट प्रोजेक्ट के परिणामों के आधार पर तकनीक की उपयोगिता और यात्रियों को मिलने वाली सुविधा का आकलन करने के निर्देश दिए हैं।
मध्यप्रदेश में टोलिंग व्यवस्था बदलेगी?
यदि फंदा टोल प्लाजा पर किया जा रहा परीक्षण सफल रहता है तो आने वाले समय में मध्यप्रदेश के कई टोल प्लाजा पर वाहन चालकों को बिना रुके गुजरने की सुविधा मिल सकती है।
सरकार का फोकस सड़क अधोसंरचना के साथ-साथ तकनीक आधारित यातायात व्यवस्था विकसित करने पर है। बैरियर-लेस टोलिंग इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है।
अब सबकी नजर फंदा टोल प्लाजा के पायलट परीक्षण के परिणामों पर रहेगी। यदि सिस्टम उम्मीदों के मुताबिक काम करता है, तो 2027 से भोपाल–देवास मार्ग पर इसकी व्यापक शुरुआत मध्यप्रदेश की टोल व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है।
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