पठारी को कब मिलेगा नगर पंचायत का हक? धरातल पर हर पैमाना खरा, फिर फाइलों में क्यों उलझा विदिशा की सबसे बड़ी पंचायत का भविष्य!
विदिशा भारती डेस्क | पठारी
आबादी शहर जैसी और बजट गांव का! विदिशा जिले की सबसे प्रमुख और विशाल ग्राम पंचायत पठारी आज एक अजीब विरोधाभास से जूझ रही है। कहने को पठारी तहसील मुख्यालय है, व्यापारिक केंद्र है और हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का आधार है, लेकिन प्रशासनिक पहचान के नाम पर इसे आज भी ग्राम पंचायत के संकरे दायरे में समेट कर रखा गया है। नतीजा यह है कि लगातार बढ़ती जनसंख्या के मुकाबले ग्राम पंचायत के संसाधन बेहद बौने साबित हो रहे हैं। पानी, सफाई, स्ट्रीट लाइट, सुव्यवस्थित कचरा प्रबंधन और सुनियोजित विकास जैसी बुनियादी जरूरतें पंचायत के सीमित बजट की भेंट चढ़ रही हैं। सवाल यह उठता है कि जब धरातल पर नगर पंचायत बनने की हर एक शर्त पूरी हो रही है, तब शासन-प्रशासन की फाइलों में यह फैसला किस पेंच में फंसा हुआ है?
तहसील का रुतबा, मगर सुविधाएं आज भी 'पंचायत' वाली
पठारी सिर्फ एक साधारण गांव नहीं, बल्कि आसपास के दर्जनों गांवों की जीवनरेखा है। तहसील मुख्यालय का दर्जा मिलने के बाद यहां प्रशासनिक अमला बैठा, न्यायालयीन और राजस्व कामकाज का दायरा फैला, व्यापार बढ़ा और बाहर से आकर बसने वाले लोगों की संख्या में जबरदस्त उछाल आया।
विकास की रफ्तार तो शहरी स्तर पर पहुंच गई, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था वही दशकों पुरानी ग्राम पंचायत प्रणाली पर टिकी है। किसी ग्राम पंचायत का सालाना बजट और प्रशासनिक अमला एक सीमित ग्रामीण आबादी के हिसाब से तय होता है। जब वही पंचायत 20 हजार से ज्यादा नागरिकों के दैनिक जीवन, बाजार की व्यवस्था, स्वच्छता और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर का बोझ उठाने लगे, तो व्यवस्था का चरमराना स्वाभाविक है। नालियों की सफाई से लेकर पेयजल आपूर्ति तक के लिए पंचायत को संघर्ष करना पड़ रहा है।
नगर पालिका अधिनियम 2011: पठारी हर कसौटी पर खरी
मध्य प्रदेश में नगर पालिका अधिनियम 1961 में वर्ष 2011 में ऐतिहासिक संशोधन किया गया था, जिसके तहत नगर परिषद (नगर पंचायत) गठन के नियम तय किए गए थे। अगर इन सरकारी नियमों के तराजू पर पठारी को तौला जाए, तो यह हर पैमाने पर पूरी तरह फिट बैठती है:
- सालाना राजस्व: नियम के मुताबिक उन्नयन के लिए न्यूनतम 10 लाख रुपये वार्षिक राजस्व होना जरूरी है। पठारी ग्राम पंचायत का राजस्व इस न्यूनतम सीमा को आसानी से पार कर चुका है।
- सड़क और नाली निर्माण: नियम कहता है कि कम से कम 30 प्रतिशत पक्की सड़कें और नालियां हों। हकीकत यह है कि पठारी में 90 प्रतिशत से अधिक पक्की सड़कों और नालियों का जाल बिछ चुका है।
- गैर-कृषि अर्थव्यवस्था: नगर पंचायत के लिए जरूरी है कि आबादी का बड़ा हिस्सा गैर-कृषि गतिविधियों से जुड़ा हो। पठारी की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी व्यापार, नौकरी, कारीगरी और अन्य व्यावसायिक सेवाओं से अपनी आजीविका चलाती है।
- सघन आबादी और टैक्स ढांचा: क्षेत्र के 95 प्रतिशत से अधिक मकान भवन कर के दायरे में आते हैं। सघन शहरी आबादी 70 प्रतिशत से अधिक है और जरूरी अनुपात में शासकीय भवनों की मौजूदगी भी है।
जब जमीन पर हर एक शर्त पूरी है, तो फिर पठारी को उसका वैधानिक दर्जा देने में देरी क्यों?
कहां अटका है कागजी पेच? 2011 की जनगणना का फेर
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी अड़चन बनी हुई है पुरानी जनगणना की तकनीकी बाध्यता। नियमों के तहत नगर पंचायत गठन के लिए न्यूनतम 20 हजार की जनसंख्या अनिवार्य मानी गई है। 2011 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों में पठारी की आबादी 9,480 दर्ज थी।
आज जमीनी हकीकत यह है कि बीते डेढ़ दशक में पठारी का विस्तार तेजी से हुआ है। वर्तमान में पठारी कस्बे की वास्तविक और अस्थायी आबादी 20 हजार का आंकड़ा आराम से पार कर चुकी है। सिर्फ 15 साल पुराने एक कागजी रिकॉर्ड के आधार पर आज की जीवंत आबादी को बुनियादी नागरिक सुविधाओं से वंचित रखना किसी भी नजरिए से व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता।
समाधान का फॉर्मूला: इन पंचायतों के विलय से खुल सकती है राह
अगर तकनीकी रूप से 2011 के जनगणना आंकड़ों को ही आधार बनाना पड़े, तो भी शासन के पास इसका सटीक और व्यावहारिक समाधान मौजूद है। पठारी का भूगोल ऐसा है कि आसपास की नजदीकी पंचायतों को जोड़कर एक सशक्त नगर परिषद का गठन चुटकियों में किया जा सकता है:
- बड़ोह ग्राम पंचायत: पठारी और ऐतिहासिक बड़ोह के बीच महज 40 बीघा का तालाब है। दोनों बस्तियां भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं।
- विस्थापित कॉलोनी: हनोता डैम डूब क्षेत्र में आई ग्राम पंचायत जाजपोन की विस्थापित कॉलोनी बड़ोह के पठार पर बसाई जा रही है, जहां करीब 1,000 नागरिक पुनर्वासित हो रहे हैं।
- निकटवर्ती पंचायतें: 3 किलोमीटर के दायरे में स्थित ग्राम पंचायत छपारा, ग्राम पंचायत मथुरापुर, ग्राम पंचायत बरखेड़ा और ग्राम हासमपुर को शामिल कर लिया जाए, तो 2011 की जनगणना के आधार पर भी कुल आबादी 20 हजार के आंकड़े को आसानी से पार कर जाती है।
इस क्लस्टर को मिलाकर एक संयुक्त नगर परिषद बनाने से न केवल कानूनी अर्हता पूरी होगी, बल्कि पूरे इलाके के समन्वित विकास का मास्टर प्लान तैयार हो सकेगा।
जनआक्रोश की आहट: हस्ताक्षर अभियान और आंदोलन की तैयारी
पठारी क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों, व्यापारियों और युवाओं का धैर्य अब जवाब दे रहा है। स्थानीय बाशिंदों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अफसरों की उपेक्षा के चलते पठारी का विकास रुका हुआ है। यदि सरकार ने जल्द ही पठारी को नगर पंचायत घोषित करने की प्रक्रिया शुरू नहीं की, तो इसे लेकर जनआंदोलन छेड़ा जाएगा।
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