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जब भक्त के हठ के आगे झुक गए प्रभु राम: सीहोर के छात्रों ने 'केवट संवाद' से बिखेरा भक्ति का जादू

10-06-2026  Editor Shubham Jain  86 views
जब भक्त के हठ के आगे झुक गए प्रभु राम: सीहोर के छात्रों ने 'केवट संवाद' से बिखेरा भक्ति का जादू

सीहोर: रामायण का वह दृश्य भला कौन भूल सकता है, जब गंगा पार कराने की एवज में केवट ने प्रभु श्री राम के चरणों को पखारने की जिद पकड़ ली थी। भक्त का वह निश्छल प्रेम और भगवान की वह सहज स्वीकारोक्ति—सीहोर के एक विद्यालय में जब यही 'केवट संवाद' मंच पर जीवंत हुआ, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

संगीत नाटक अकादमी, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सौजन्य से 'यूनिटी फॉर सोशल ऐंड ह्यूमन वेल्फेयर सोसायटी' द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम ने उपस्थित दर्शकों को त्रेता युग की यादों में खो जाने पर मजबूर कर दिया।

अभिनय ऐसा कि दर्शक हो गए भावविभोर

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ हुई। लेकिन जैसे ही पर्दा उठा, विद्यालय के नन्हे-मुन्ने कलाकारों ने अपने अभिनय से मंच पर जान फूँक दी। नाटक का मुख्य आकर्षण 'केवट' की भूमिका निभाने वाले छात्र का अभिनय रहा। अपनी संवाद अदायगी और भाव-भंगिमाओं से उन्होंने दिखाया कि भक्ति में कितनी शक्ति होती है। विशेष रूप से वह भावुक दृश्य, जब केवट प्रभु राम के चरणों को धोने की विनम्र जिद्द करता है, दर्शकों की आँखों में आँसू लाने के लिए काफी था।

यह नाटक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आज की युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, अटूट आस्था और विनम्रता का पाठ पढ़ाने का एक सार्थक प्रयास था।

एक माह की मेहनत और लक्ष्मी पांडे का निर्देशन

इस भव्य मंचन के पीछे एक महीने की कड़ी मेहनत छिपी है। नाटक का लेखन और निर्देशन संस्था की अध्यक्ष लक्ष्मी पांडे ने किया है। मंच की शोभा बढ़ाती वेशभूषा के लिए रेखा शुक्ला और योगेश तिवारी का विशेष योगदान रहा।

विद्यालय के प्रधानाचार्य ने कलाकारों की सराहना करते हुए कहा, “ऐसे आयोजन बच्चों को हमारी महान परंपराओं से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं। आज की भागदौड़ भरी दुनिया में सेवा और विनम्रता का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है।”

कलाकारों का हुआ सम्मान

कार्यक्रम के समापन पर सभी बाल कलाकारों को सम्मानित किया गया। अभिभावकों और अतिथियों ने नाटक की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह ने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि यदि सही मार्गदर्शन मिले, तो हमारे बच्चे अपनी संस्कृति को मंच पर उतारकर न केवल उसे जीवित रख सकते हैं, बल्कि समाज को भी एक नई दिशा दिखा सकते हैं।


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