विदिशा:कानून के रखवाले जब खुद अपनी आंखों पर पट्टी और कानों में रुई डालकर बैठ जाएं, तो फिर न्याय की देवी का दरवाजा खटखटाना ही पड़ता है। कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक कदम उठाया है मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के जाने-माने और बेबाक सामाजिक कार्यकर्ता विनोद के. शाह ने। उनकी एक मजबूत और धारदार कानूनी लड़ाई ने अब राष्ट्रीय राजधानी तक ऐसा भूचाल ला दिया है कि देश के 17 राज्यों की सरकारें हिल गई हैं। मामला है कान के परदे फाड़ने वाले डीजे, बेतहाशा शोर और सड़कों पर मौत बनकर दौड़ती डीजे गाड़ियों की तेज व चौंधिया देने वाली रोशनी का। इस अति गंभीर और जानलेवा मुद्दे पर अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इतना सख्त रुख अपना लिया है कि लापरवाह प्रशासनिक अधिकारियों और मनमाने डीजे संचालकों की नींद उड़ना तय है।
डीजे वाहनों का आतंक और सड़क हादसे: आयोग ने मांगी कड़ी जवाबदेही
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के माननीय सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली एक विशेष और सख्त पीठ ने इस मामले पर मैराथन सुनवाई करते हुए बड़ा और निर्णायक एक्शन लिया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि अब जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मध्यप्रदेश समेत देश के कुल 17 राज्यों ने इस गंभीर मामले पर अपनी विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट आयोग को सौंप दी है, जबकि बाकी बचे सभी राज्यों को कड़ी चेतावनी देते हुए महज दो सप्ताह के भीतर अपनी फाइनल रिपोर्ट पेश करने का अंतिम अल्टीमेटम थमाया गया है।
आयोग ने अपनी सख्त समीक्षा में यह भी स्पष्ट किया है कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 7 और 15 के निर्धारित दायरों का उल्लंघन करने वाले और तय डेसिबल की सीमा से कोसों आगे जाकर कान फोड़ू शोर मचाने वाले किसी भी सूरत में बख्शे नहीं जाएंगे। यह कृत्य सीधा-सीधा गैर-जमानती और दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। आयोग ने दो टूक शब्दों में कहा है कि सिर्फ कार्यक्रम के आयोजक या डीजे संचालक ही नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र में इन नियमों के पालन में ढिलाई बरतने वाले और हाथ पर हाथ धरे बैठे सुस्त प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही भी अब निश्चित तौर पर तय की जानी चाहिए।
वाहन कानूनों की धज्जियां उड़ाने वालों पर कसेगा शिकंजा
सड़कों पर वाहन चलाते समय आंखों को पूरी तरह चौंधिया देने वाली डीजे गाड़ियों की बेहिसाब चमकीली लाइटें अक्सर मध्य प्रदेश सहित पूरे देश में भयानक सड़क हादसों और अनगिनत मौतों का सबब बनती हैं। आयोग ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 52 और 190 का पुरजोर हवाला देते हुए कहा है कि डीजे वाहनों की मूल और निर्धारित बनावट में अवैध रूप से छेड़छाड़ करके उन पर खतरनाक फ्लड लाइट्स और उच्च क्षमता वाले साउंड उपकरण लगाना कानून के खिलाफ है। ऐसे अवैध वाहनों और उनके संरक्षकों के खिलाफ जमीनी स्तर पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय जिला प्रशासन को विशेष निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश और संविधान का अनुच्छेद 21
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने इस महत्वपूर्ण नोटिस में देश की सर्वोच्च अदालत के उन तमाम ऐतिहासिक और नजीर बनने वाले निर्देशों की भी जोरदार याद दिलाई है, जिनमें साफ आदेश दिए गए हैं कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी परिस्थिति में लाउडस्पीकर, कान फाड़ने वाले डीजे और तेज आवाज वाली आतिशबाजी पर पूरी तरह पाबंदी रहेगी। विदिशा जैसे शहरों में छात्र-छात्राएं, बुजुर्ग और अस्पताल में भर्ती मरीज लंबे समय से इस कोलाहल से त्रस्त थे।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए आयोग ने स्पष्ट किया है कि एक शांत, सुरक्षित और पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त वातावरण में सांस लेना और जीवन बिताना देश के हर नागरिक का पवित्र मौलिक अधिकार है। यदि कोई असामाजिक तत्व या व्यावसायिक माफिया इस अधिकार पर कुठाराघात करता है, तो राज्य सरकारों और स्थानीय जिला प्रशासन का यह प्राथमिक दायित्व बनता है कि वे सख्त से सख्त कानून का डंडा चलाकर आम नागरिकों को राहत दिलाएं। विदिशा की इस जमीन से उठी बुलंद आवाज ने अब पूरे देश में ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ एक बड़ा और असरदार जनआंदोलन छेड़ दिया है।
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