इंदौर। मध्यप्रदेश के इंदौर में भागीरथपुरा के बहुचर्चित दूषित पानी कांड में अब जांच रिपोर्ट से जुड़े सामने आए तथ्यों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 36 मौतों की जांच के लिए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा गठित एक सदस्यीय न्यायिक समिति ने अपनी रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत कर दी है। हालांकि रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन सामने आए प्रमुख बिंदुओं के अनुसार 36 में से 24 मौतों को दूषित पानी से जुड़ा माना गया है, जबकि 12 मामलों में मौत के कारण को स्पष्ट नहीं बताया गया है।
रिपोर्ट में पाइपलाइन बदलने के काम और उससे जुड़ी टेंडर प्रक्रिया में देरी को घटना की अहम वजहों में शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं नगर निगम के जल कार्य विभाग से जुड़े अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में दो अधिकारियों की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आई है, हालांकि संबंधित अधिकारियों के नाम और रिपोर्ट के अंतिम निष्कर्षों पर अदालत की प्रक्रिया पूरी होना बाकी है।
अभी सार्वजनिक नहीं हुई न्यायिक जांच रिपोर्ट
भागीरथपुरा मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट अदालत में जमा कर दी है। फिलहाल रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है और यह हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के पास सुरक्षित होने की जानकारी सामने आई है।
मामले से जुड़े पक्षकारों के अधिकृत अधिवक्ताओं को रजिस्ट्रार कार्यालय में रिपोर्ट का अवलोकन करने की अनुमति होने की बात भी सामने आई है। रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग पर हाईकोर्ट में आगे सुनवाई होनी है। इसलिए रिपोर्ट के सामने आए बिंदुओं को फिलहाल प्रारंभिक और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर सामने आई जानकारी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
36 मौतों में 24 को दूषित पानी से जोड़ा गया
रिपोर्ट से जुड़े सामने आए प्रमुख बिंदुओं के अनुसार भागीरथपुरा में हुई कुल 36 मौतों में से 24 मौतों को दूषित पानी से हुई मौत माना गया है। वहीं बाकी 12 मामलों में मौत का कारण स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किए जाने की जानकारी है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या सामने आने के बाद बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े थे और कई लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। अब न्यायिक जांच में 24 मौतों को दूषित पानी से जोड़ने की जानकारी सामने आने से पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे और जवाबदेही का मुद्दा फिर केंद्र में आ गया है।
20 लाख रुपये मुआवजे की सिफारिश की जानकारी
मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार न्यायिक समिति ने दूषित पानी से हुई मौतों के मामलों में मृतकों के परिजनों को 20 लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश की है।
इसके अलावा दूषित पानी से प्रभावित लोगों के लिए 5 लाख रुपये तक की सहायता/मुआवजे की अनुशंसा किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। यह प्रस्ताव वर्तमान में चर्चा में रहे मुआवजे से अधिक है, लेकिन जब तक हाईकोर्ट की ओर से रिपोर्ट और उसके आधार पर कोई अंतिम आदेश सार्वजनिक नहीं होता, तब तक इसे अंतिम स्वीकृत मुआवजा नहीं माना जा सकता।
पाइपलाइन और टेंडर प्रक्रिया में देरी पर सवाल
जांच रिपोर्ट के सामने आए प्रमुख बिंदुओं में पाइपलाइन बदलने में देरी को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना गया है। रिपोर्ट से जुड़ी जानकारी के मुताबिक यदि क्षतिग्रस्त या पुरानी पाइपलाइन को समय रहते बदला जाता तो दूषित पानी की स्थिति को टाला जा सकता था।
पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया के साथ-साथ टेंडर और प्रशासनिक स्वीकृति में हुई देरी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। जांच में नगर निगम के जल कार्य विभाग से जुड़े अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर जिम्मेदारी तय किए जाने की जानकारी सामने आई है।
दो अधिकारियों की भूमिका पर उठी उंगली
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक न्यायिक जांच में दो अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराए जाने की बात सामने आई है। हालांकि रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, इसलिए जिम्मेदारी की पूरी प्रकृति और संबंधित अधिकारियों के नामों को लेकर आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।
यही वजह है कि फिलहाल किसी अधिकारी को अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया मानना सही नहीं होगा। न्यायिक समिति की रिपोर्ट में जिम्मेदारी तय करने की बात और अदालत का अंतिम निर्णय—दोनों अलग-अलग कानूनी चरण हैं।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी चर्चा
सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक जांच समिति ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और मेयर-इन-काउंसिल की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी नहीं मानी है। कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को भी सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराए जाने की जानकारी सामने आई है।
इससे जांच का फोकस मुख्य रूप से प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर पाइपलाइन तथा जल आपूर्ति से जुड़े कामकाज पर जाता दिखाई देता है। हालांकि रिपोर्ट सार्वजनिक होने और अदालत के अंतिम आदेश के बाद ही इस विषय पर पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
अब हाईकोर्ट के अगले कदम पर नजर
भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में न्यायिक समिति की रिपोर्ट सामने आने की जानकारी ने पीड़ित परिवारों और पूरे शहर का ध्यान हाईकोर्ट की अगली कार्रवाई पर केंद्रित कर दिया है।
एक तरफ 24 मौतों को दूषित पानी से जोड़ने और 20 लाख रुपये मुआवजे की सिफारिश की जानकारी सामने आई है, वहीं दूसरी तरफ रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है। ऐसे में अब सबसे महत्वपूर्ण होगा कि हाईकोर्ट रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और उसके निष्कर्षों पर आगे क्या आदेश देता है।
भागीरथपुरा की घटना ने इंदौर की पेयजल व्यवस्था, पाइपलाइन रखरखाव और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े किए थे। यदि जांच रिपोर्ट में सामने आए बिंदुओं की अदालत से पुष्टि होती है, तो यह मामला भविष्य में शहरी जल आपूर्ति व्यवस्था में जवाबदेही तय करने के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
फिलहाल रिपोर्ट के आधिकारिक रूप से सार्वजनिक होने और हाईकोर्ट के आदेश का इंतजार है।
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