धार। मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक भोजशाला और वहां विराजमान होने वाली मां सरस्वती (वाग्देवी) की मूर्ति की घर वापसी का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। लेकिन, इस बार खबर आस्था से जुड़ी उम्मीदों को बड़ा झटका देने वाली है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक आरटीआई (RTI) के जवाब में जो खुलासा किया है, उसने सरकार के अब तक के दावों पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
क्या वाकई वाग्देवी को लाने की हो रही है कोशिश?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में भोजशाला को देवी सरस्वती का मंदिर घोषित करते हुए केंद्र सरकार को वाग्देवी की मूर्ति वापस लाने पर विचार करने का सुझाव दिया था। इसी उम्मीद के बीच, जब RTI के जरिए यह जानने की कोशिश की गई कि सरकार अब तक इस दिशा में क्या कर रही है, तो ASI भोपाल सर्कल का जवाब चौंकाने वाला था।
ASI ने साफ कहा कि "लंदन म्यूजियम से सरस्वती की मूर्ति वापस लाने से संबंधित कोई पत्र-व्यवहार नहीं हुआ है।" यानी, जिस मूर्ति को वापस लाने के लिए सालों से बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे, उसके लिए कागजों पर अब तक एक भी कदम नहीं उठाया गया है।
आखिर मूर्ति के साथ क्या हुआ?
इतिहास का गवाह: 11वीं सदी की यह दुर्लभ प्रतिमा राजा भोज के काल की मानी जाती है।
लंदन का सफर: 1875 में धार की खुदाई में मिली यह मूर्ति 1880 में एक ब्रिटिश अधिकारी के जरिए इंग्लैंड पहुंच गई और अब ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है।
सियासी वादे: 2003 में संसद से लेकर 2022 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री के बयानों तक, मूर्ति वापसी को लेकर सिर्फ 'कोशिशें' दोहराई जाती रहीं, लेकिन धरातल पर नतीजा शून्य रहा।
आस्था बनाम सियासत
'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' जैसे संगठनों का कहना है कि यह महज एक पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। हाई कोर्ट के फैसले के बाद प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कानूनी कदम उठाने की गुहार भी लगाई गई है।
अब सवाल यह है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड में 'शून्य' होने का मतलब वाग्देवी की वापसी का रास्ता बंद हो गया है? या फिर इस खुलासे के बाद केंद्र सरकार अब अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाएगी? भोजशाला परिसर में दर्शन और वाग्देवी की प्रतीक्षा के बीच, अब हर किसी की नजर दिल्ली के गलियारों पर है।
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